Shamli Conversion Case: बालिग व्यक्ति अपनी पसंद का धर्म चुनने के लिए स्वतंत्र, इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला
बालिग को धर्म चुनने की आजादी, इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला

उत्तर प्रदेश के शामली से जुड़े धर्म परिवर्तन मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वयस्क व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और धार्मिक पसंद को लेकर अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि एक बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद का धर्म चुनने और अपनी जिंदगी से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले लेने की स्वतंत्रता है। यह मामला शामली निवासी आयुष मलिक से जुड़ा है, जिन्होंने अदालत के सामने कहा कि उन्होंने अपनी इच्छा से इस्लाम धर्म अपनाया था।

क्या है पूरा मामला?
मामला शामली के आयुष मलिक से जुड़ा है। अदालत में पेश किए गए रिकॉर्ड के मुताबिक आयुष की उम्र 31 साल है। उन्होंने कोर्ट को बताया कि उन्होंने साल 2014 में अपनी इच्छा से इस्लाम धर्म अपनाया था और इसमें किसी तरह का दबाव, धमकी, लालच या जबरदस्ती नहीं थी। इसके बाद वह इस्लाम की धार्मिक प्रथाओं का पालन कर रहे थे।
आयुष ने यह भी बताया कि वह चांदनी कुरैशी से शादी करना चाहते हैं। उनके परिवार को यह फैसला मंजूर नहीं था। इसी विवाद के बाद मामला पुलिस और फिर इलाहाबाद हाईकोर्ट तक पहुंचा।
परिवार की शिकायत के बाद दर्ज हुई थी FIR
रिपोर्टों के मुताबिक आयुष के पिता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि उनके बेटे का धर्म परिवर्तन कराया गया और इसके पीछे अन्य उद्देश्य थे। इसके बाद शामली पुलिस स्टेशन में चांदनी कुरैशी और उनके रिश्तेदारों के खिलाफ उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 और भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत FIR दर्ज की गई।
मामले में नामजद चांदनी और उनके पिता को बाद में जिला अदालत से जमानत भी मिल गई थी। वहीं आयुष को परिवार द्वारा कथित रूप से रोके जाने का आरोप लगाते हुए हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की गई।
कोर्ट में पेश हुए आयुष मलिक
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पहले आयुष को अदालत के सामने पेश करने का निर्देश दिया था। 16 सितंबर 2026 को शामली पुलिस ने उन्हें कोर्ट में पेश किया। सुनवाई के दौरान आयुष ने स्पष्ट रूप से कहा कि उन्होंने अपनी इच्छा से इस्लाम धर्म अपनाया है और वह अपनी पसंद के मुताबिक जीवन जीना चाहते हैं।
अदालत ने उनके बयान और उपलब्ध रिकॉर्ड पर विचार करने के बाद उन्हें परिवार की हिरासत से मुक्त करने का आदेश दिया।
धर्म और जीवनसाथी चुनने के अधिकार पर कोर्ट की टिप्पणी
न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकलपीठ ने कहा कि वयस्क व्यक्ति को यह तय करने की स्वतंत्रता है कि वह किस धर्म को माने और किस व्यक्ति के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित करे। कोर्ट के अनुसार, केवल यह तथ्य कि किसी व्यक्ति का फैसला उसके परिवार की इच्छा या अपेक्षाओं के विपरीत है, उसके फैसले पर रोक लगाने का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता।
अदालत की टिप्पणी व्यक्तिगत स्वायत्तता और संवैधानिक स्वतंत्रता के संदर्भ में थी। रिपोर्टों में इसे संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 25 से जुड़ी स्वतंत्रताओं के संदर्भ में बताया गया है।
क्या कोर्ट ने धर्म परिवर्तन कानून को खत्म किया?
नहीं। इस आदेश को उत्तर प्रदेश के धर्म परिवर्तन कानून को खत्म करने या सभी धर्मांतरण मामलों को स्वतः वैध घोषित करने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
इस मामले में कोर्ट ने आयुष के व्यक्तिगत बयान और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर उनकी स्वतंत्रता से जुड़े सवाल पर फैसला दिया। जुलाई 2026 में इसी मामले से जुड़ी एक अन्य कार्यवाही में हाईकोर्ट ने कहा था कि उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर प्रथम दृष्टया जबरदस्ती धर्म परिवर्तन के संकेत नहीं दिखते, हालांकि मामले की जांच जारी रहने की बात भी कही गई थी।
हाईकोर्ट के फैसले का क्या मतलब है?
इस मामले में अदालत ने मूल रूप से यह स्पष्ट किया कि बालिग व्यक्ति के व्यक्तिगत फैसले को केवल पारिवारिक असहमति के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता, बशर्ते उसके फैसले में कानून के अनुसार जबरदस्ती, धोखाधड़ी या अन्य अवैध परिस्थितियां साबित न हों।
शामली का यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि इसमें धर्म परिवर्तन, अंतरधार्मिक विवाह, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राज्य के धर्म परिवर्तन कानून—इन सभी से जुड़े कानूनी पहलू सामने आए हैं।
मामले की मुख्य बातें
- मामला शामली के 31 वर्षीय आयुष मलिक से जुड़ा है।
- आयुष ने कोर्ट में कहा कि उन्होंने अपनी इच्छा से इस्लाम धर्म अपनाया।
- उन्होंने धर्म परिवर्तन में दबाव या जबरदस्ती से इनकार किया।
- वह चांदनी कुरैशी से शादी करना चाहते हैं।
- परिवार की शिकायत के बाद पुलिस केस दर्ज हुआ था।
- हाईकोर्ट ने आयुष को अदालत में पेश करने का आदेश दिया।
- कोर्ट ने उन्हें अपनी पसंद का धर्म मानने और जीवन के फैसले लेने की स्वतंत्रता दी।
- यह फैसला उत्तर प्रदेश के धर्म परिवर्तन कानून को खत्म करने वाला आदेश नहीं है।

