Israel Election : इजरायल चुनाव 2026 में नेतन्याहू की सत्ता को चुनौती देंगे चार बड़े नेता
इजरायल चुनाव में नेतन्याहू की सत्ता पर संकट? ये चार नेता बदल सकते हैं सियासी समीकरण

यरुशलम: इजरायल की राजनीति में आगामी चुनाव को लेकर हलचल तेज है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के सामने सत्ता बचाने की चुनौती है, वहीं विपक्षी खेमे के नेता सरकार बदलने की रणनीति में जुटे हैं। गादी आइजेनकोट, नफ्ताली बेनेट, इतामार बेन-ग्विर और मंसूर अब्बास जैसे नेताओं की भूमिका चुनाव के नतीजों के साथ-साथ सरकार गठन की दिशा भी तय कर सकती है। इजरायल में चुनावी मुकाबला केवल लोकप्रियता तक सीमित नहीं है, बल्कि संसद में बहुमत जुटाने और अलग-अलग दलों को साथ लाने की क्षमता भी बेहद अहम है।
7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमलों के बाद इजरायल की सुरक्षा नीति, युद्ध प्रबंधन और सरकार के फैसलों को लेकर लगातार बहस होती रही है। ऐसे में मतदाताओं के सामने बड़ा सवाल है कि क्या नेतन्याहू एक बार फिर सत्ता में वापसी करेंगे या देश की राजनीति में नए नेतृत्व को मौका मिलेगा।
कैसे बनती है इजरायल में सरकार?
इजरायल में मतदाता सीधे प्रधानमंत्री नहीं चुनते, बल्कि राजनीतिक दलों को वोट देते हैं। देश की संसद को नेसेट कहा जाता है, जिसमें कुल 120 सदस्य होते हैं। सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी होता है। किसी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में गठबंधन की राजनीति निर्णायक बन जाती है।
यही वजह है कि चुनाव में कम सीटें जीतने वाली पार्टियां भी सरकार गठन के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। उनके समर्थन के बदले नीतियों, मंत्रालयों और राजनीतिक प्राथमिकताओं को लेकर समझौते हो सकते हैं। इस बार भी नेतन्याहू और उनके विरोधियों के लिए सहयोगी दलों का समर्थन जुटाना बड़ी चुनौती बन सकता है।
गादी आइजेनकोट से नेतन्याहू को चुनौती
गादी आइजेनकोट इजरायल के पूर्व सैन्य प्रमुख हैं और सुरक्षा मामलों में अपने अनुभव के कारण जाने जाते हैं। नेतन्याहू के विरोधी खेमे में उन्हें एक संभावित वैकल्पिक नेतृत्व के रूप में देखा जाता है। इजरायल में सुरक्षा का मुद्दा बेहद संवेदनशील है, इसलिए सैन्य अनुभव रखने वाले नेता चुनावी बहस में खास जगह बना सकते हैं।
आइजेनकोट के सामने चुनौती केवल नेतन्याहू की आलोचना करने की नहीं, बल्कि मतदाताओं को यह भरोसा दिलाने की भी होगी कि उनके नेतृत्व में सुरक्षा और सरकार के कामकाज को बेहतर बनाया जा सकता है। विपक्षी दलों के बीच तालमेल और साझा रणनीति भी उनकी राजनीतिक संभावनाओं को प्रभावित करेगी।
नफ्ताली बेनेट: पूर्व प्रधानमंत्री की वापसी पर नजर
नफ्ताली बेनेट इजरायल के पूर्व प्रधानमंत्री रह चुके हैं। वह दक्षिणपंथी विचारधारा के नेता हैं और फिलिस्तीनी राज्य के गठन का विरोध करते रहे हैं। इसके बावजूद नेतन्याहू के साथ उनके राजनीतिक और नीतिगत मतभेद रहे हैं।
बेनेट ने वर्ष 2021 में विभिन्न विचारधाराओं वाले दलों के समर्थन से गठबंधन सरकार बनाई थी। उस सरकार में यायर लैपिड की भी अहम भूमिका थी। यह घटनाक्रम दिखाता है कि इजरायल की राजनीति में वैचारिक मतभेदों के बावजूद सत्ता परिवर्तन के लिए गठबंधन संभव है।
इस बार बेनेट की अहमियत इस बात से तय हो सकती है कि वह नेतन्याहू विरोधी मतदाताओं को कितना समर्थन दिला पाते हैं और चुनाव के बाद दूसरे दलों के साथ किस तरह का समझौता करते हैं। उनकी दक्षिणपंथी छवि कुछ मतदाताओं को आकर्षित कर सकती है, जबकि नेतन्याहू से असंतुष्ट मतदाताओं के लिए वह एक विकल्प बन सकते हैं।
इतामार बेन-ग्विर: कट्टर दक्षिणपंथी राजनीति का प्रभाव
इतामार बेन-ग्विर इजरायल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री और अति-राष्ट्रवादी ओत्जमा येहुदित पार्टी के प्रमुख हैं। वह फिलिस्तीनियों को लेकर अपने कठोर रुख और विवादित बयानों के कारण चर्चा में रहते हैं। उनकी राजनीति सुरक्षा, राष्ट्रवाद और फिलिस्तीनी मुद्दे पर सख्त नीतियों के इर्द-गिर्द घूमती है।
बेन-ग्विर की पार्टी को मिलने वाली सीटें नेतन्याहू के संभावित गठबंधन के लिए महत्वपूर्ण हो सकती हैं। यदि सरकार बनाने के लिए उनके समर्थन की जरूरत पड़ती है, तो सुरक्षा नीति, गाजा और वेस्ट बैंक से जुड़े फैसलों पर उनकी मांगों का असर पड़ सकता है। हालांकि, उनकी विचारधारा को लेकर विवाद और आलोचना भी बनी हुई है।
मंसूर अब्बास: सरकार गठन में अरब दलों की भूमिका
मंसूर अब्बास इजरायल के अरब समुदाय से आने वाले प्रमुख राजनीतिक नेता हैं और राअम पार्टी का नेतृत्व करते हैं। वर्ष 2021 में उनकी पार्टी का सरकार में शामिल होना इजरायल की गठबंधन राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम था।
अब्बास ने राष्ट्रीय स्तर के विवादित मुद्दों के साथ-साथ अरब समुदायों की स्थानीय समस्याओं, अपराध पर नियंत्रण, सार्वजनिक सेवाओं और विकास पर ध्यान देने की रणनीति अपनाई है। उनकी पार्टी को मिलने वाली सीटें ऐसे चुनाव में निर्णायक साबित हो सकती हैं, जिसमें किसी बड़े दल को स्पष्ट बहुमत न मिले।
चुनाव का नतीजा क्यों होगा अहम?
इजरायल का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का सवाल नहीं है। इससे देश की सुरक्षा नीति, गाजा युद्ध को लेकर फैसले, फिलिस्तीनियों के प्रति सरकार का रुख और घरेलू राजनीतिक प्राथमिकताएं प्रभावित हो सकती हैं।
नेतन्याहू के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने समर्थकों को एकजुट रखने और बहुमत जुटाने की होगी। दूसरी ओर, विपक्ष के सामने अलग-अलग विचारधाराओं वाले दलों को एक साथ लाने की चुनौती है। आइजेनकोट, बेनेट, बेन-ग्विर और अब्बास की राजनीतिक ताकत और चुनाव के बाद उनके फैसले सत्ता के समीकरण बदल सकते हैं।

इसलिए चुनाव का वास्तविक परिणाम केवल इस बात से तय नहीं होगा कि किस पार्टी को सबसे ज्यादा वोट मिले, बल्कि इससे भी तय होगा कि कौन-सा गठबंधन नेसेट में बहुमत हासिल कर पाता है।

