Meerut Blue Drum Case: मुस्कान और साहिल को फांसी की सजा, अब जेल में कैदी नंबर 395 और 396 से होगी पहचान
मुस्कान और साहिल को फांसी, बने कैदी नंबर 395 और 396

उत्तर प्रदेश के चर्चित नीला ड्रम हत्याकांड में अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है। मेरठ की जिला अदालत ने सौरभ राजपूत की हत्या के मामले में उनकी पत्नी मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को 14 अक्टूबर 2026 को मृत्युदंड की सजा सुनाई। सजा के बाद जिला कारागार में दोनों की पहचान बदल गई है। जेल प्रशासन के मुताबिक, साहिल को कैदी नंबर 395 और मुस्कान को कैदी नंबर 396 दिया गया है। इस मामले ने मार्च 2025 में सामने आने के बाद पूरे देश का ध्यान खींचा था।
13 महीने चला मुकदमा, 126 बार हुई सुनवाई
मेरठ के जिला एवं सत्र न्यायाधीश अरविंद कुमार मिश्रा की अदालत ने करीब 13 महीने तक चले मुकदमे के बाद यह फैसला सुनाया। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने 22 गवाहों के बयान दर्ज कराए। अदालत ने 30 सितंबर 2026 को मुस्कान और साहिल को हत्या तथा सबूत मिटाने के मामले में दोषी करार दिया था। इसके बाद 14 अक्टूबर को सजा की घोषणा की गई।
अदालत ने महाभारत का जिक्र कर क्या कहा?
फैसला सुनाते समय अदालत की टिप्पणी भी चर्चा में रही। अभियोजन पक्ष के वकील केके चौबे के अनुसार, न्यायाधीश ने महाभारत का उल्लेख करते हुए कहा कि “दंड भी धर्म है।” अदालत ने अपराध की गंभीरता के अनुरूप सजा दिए जाने के सिद्धांत पर जोर दिया।
रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत ने दोनों दोषियों पर हत्या के मामले में 50-50 हजार रुपये और सबूत मिटाने से संबंधित अपराध में 20-20 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया।
क्या था मेरठ का नीला ड्रम हत्याकांड?
यह मामला 2025 में सामने आया था। सौरभ राजपूत पूर्व मर्चेंट नेवी कर्मी थे। अभियोजन पक्ष के अनुसार, 3 मार्च 2025 को उनकी हत्या की गई। आरोप था कि हत्या के बाद शव के टुकड़े कर उन्हें एक नीले प्लास्टिक ड्रम में रखा गया और ड्रम को सीमेंट से बंद करके अपराध छिपाने की कोशिश की गई।
बाद में पुलिस ने मेरठ स्थित घर से शव के अवशेष बरामद किए। जांच के दौरान मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला की भूमिका सामने आई। दोनों को गिरफ्तार किया गया और मुकदमे के दौरान गवाहों तथा अन्य साक्ष्यों के आधार पर अभियोजन पक्ष ने अपना मामला रखा।

जेल में बदली पहचान, हाईकोर्ट में अपील करेंगे
मृत्युदंड की सजा सुनाए जाने के बाद दोनों को जेल में नए कैदी नंबर दिए गए। जेल प्रशासन के मुताबिक, उनकी बैरक और जेल संबंधी व्यवस्थाओं में भी बदलाव किया गया है। रिपोर्टों के अनुसार, दोनों ने निचली अदालत के फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती देने की बात कही है।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि निचली अदालत से मृत्युदंड मिलने का अर्थ यह नहीं है कि फांसी तुरंत दी जाएगी। मृत्युदंड के मामले में उच्च न्यायालय की पुष्टि और उपलब्ध कानूनी उपायों की प्रक्रिया अहम होती है। आगे की कार्रवाई इसी कानूनी प्रक्रिया के तहत होगी।
इस फैसले के बाद सौरभ राजपूत के परिवार को न्याय मिलने की उम्मीद से जुड़ी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। अब मामले में अगला महत्वपूर्ण चरण उच्च न्यायालय में संभावित अपील और मृत्युदंड की कानूनी समीक्षा होगा।



