पश्चिम बंगाल को मिले 23 नए GI टैग, भारत का तीसरा सबसे ज्यादा GI टैग वाला राज्य बना
पश्चिम बंगाल को मिले 23 नए GI टैग, भारत का तीसरा सबसे ज्यादा GI टैग वाला राज्य बना बंगाल

पश्चिम बंगाल ने भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication-GI) के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल की है। राज्य के 23 पारंपरिक उत्पादों को GI टैग मिलने के बाद पश्चिम बंगाल अब भारत का तीसरा सबसे अधिक GI टैग वाला राज्य बन गया है। इस उपलब्धि से राज्य के हस्तशिल्प, पारंपरिक मिठाइयों, कृषि उत्पादों और लोक कलाओं को राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलने की उम्मीद है।

क्या होता है GI टैग?
GI (Geographical Indication) टैग किसी ऐसे उत्पाद को दिया जाता है जिसकी गुणवत्ता, विशेषता या प्रतिष्ठा किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ी होती है। यह टैग उस उत्पाद की मौलिक पहचान को कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है और नकली उत्पादों पर रोक लगाने में मदद करता है।
भारत में GI टैग का पंजीकरण Geographical Indications of Goods (Registration and Protection) Act, 1999 के तहत किया जाता है।
किन 23 उत्पादों को मिला GI टैग?
इस बार पश्चिम बंगाल के जिन पारंपरिक उत्पादों को GI टैग मिला है, उनमें कई प्रसिद्ध मिठाइयां, हस्तशिल्प और सांस्कृतिक उत्पाद शामिल हैं। प्रमुख उत्पादों में—
- बांग्लार नोलेन गुर (Banglar Nolen Gur)
- जलभरा संदेश (Jalbhora Sandesh)
- मनोहरा संदेश (Monohara Sandesh)
- मेचा संदेश (Mecha Sandesh)
- संतिनिकेतन बाटिक (Santiniketan Batik)
- संतिनिकेतन एकतारा (Santiniketan Ektara)
- कृष्णनगर की मिट्टी की गुड़िया
- कूचबिहार की शीतलपाटी (Sitalpati)
- बालागढ़ की पारंपरिक नाव
- कोलकाता ज्वेलरी
- कनाकचूर मुरी (Kanakchur Popped Rice)
जैसे कई उत्पाद शामिल हैं।
तीसरे स्थान पर पहुंचा पश्चिम बंगाल
23 नए GI टैग मिलने के बाद पश्चिम बंगाल के कुल 59 GI पंजीकृत उत्पाद हो गए हैं। इसके साथ ही राज्य ने भारत में GI टैग के मामले में तीसरा स्थान हासिल कर लिया है। इस सूची में पश्चिम बंगाल से आगे केवल उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु हैं।
किसानों और कारीगरों को होगा बड़ा फायदा
GI टैग मिलने से राज्य के हजारों किसानों, मिठाई निर्माताओं, बुनकरों और कारीगरों को सीधा लाभ मिलने की उम्मीद है।
इसके प्रमुख फायदे—
- उत्पादों की ब्रांड वैल्यू बढ़ेगी।
- नकली उत्पादों पर रोक लगेगी।
- घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहचान मजबूत होगी।
- निर्यात बढ़ने की संभावना रहेगी।
- स्थानीय कारीगरों और किसानों की आय में वृद्धि हो सकती है।
संस्कृति और विरासत को मिलेगा संरक्षण
विशेषज्ञों का मानना है कि GI टैग केवल आर्थिक लाभ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह किसी क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित करने का भी प्रभावी माध्यम है।
पश्चिम बंगाल की कई सदियों पुरानी मिठाइयों, हस्तशिल्प और लोक कला को अब वैश्विक स्तर पर अलग पहचान मिलने की संभावना है।
पहले से प्रसिद्ध हैं बंगाल के कई GI उत्पाद
पश्चिम बंगाल पहले से ही कई प्रतिष्ठित GI टैग उत्पादों के लिए जाना जाता है, जिनमें—
- दार्जिलिंग चाय (Darjeeling Tea)
- बालूचरी साड़ी
- नक्षी कांथा
- बंगाल रसगुल्ला
- गोविंदभोग चावल
- जयनगर मोआ
जैसे उत्पाद शामिल हैं। अब 23 नए उत्पाद जुड़ने से राज्य का GI पोर्टफोलियो और मजबूत हो गया है।
निर्यात और पर्यटन को मिलेगा बढ़ावा
GI टैग मिलने के बाद इन उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग बढ़ सकती है। साथ ही, राज्य के विभिन्न जिलों में बनने वाले पारंपरिक उत्पादों को देखने और खरीदने के लिए पर्यटन को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
सरकार और उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी और स्थानीय रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।
GI टैग क्यों है महत्वपूर्ण?
GI टैग के प्रमुख लाभ—
- उत्पाद की कानूनी सुरक्षा।
- नकली ब्रांडिंग पर रोक।
- वैश्विक बाजार में विश्वसनीय पहचान।
- पारंपरिक शिल्प और कृषि उत्पादों का संरक्षण।
- स्थानीय उत्पादकों की आय बढ़ाने में मदद।
- निर्यात को प्रोत्साहन।
निष्कर्ष
पश्चिम बंगाल को एक साथ 23 नए GI टैग मिलना राज्य की सांस्कृतिक और आर्थिक विरासत के लिए बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। अब 59 GI टैग के साथ पश्चिम बंगाल भारत का तीसरा सबसे अधिक GI टैग वाला राज्य बन गया है। यह उपलब्धि न केवल राज्य के किसानों, कारीगरों और मिठाई निर्माताओं के लिए नए अवसर लेकर आएगी, बल्कि भारतीय पारंपरिक उत्पादों को वैश्विक पहचान दिलाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।


