Punjab Stubble Burning : पंजाब में अचानक बढ़ी आग, आखिर कौन से जिले सबसे ज्यादा प्रभावित?
पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं में बड़ा उछाल, 440 नए मामले आए सामने, इन जिलों में सबसे ज्यादा आगजनी

पंजाब में धान की कटाई के साथ ही पराली जलाने की घटनाएं एक बार फिर तेजी से बढ़ने लगी हैं। खेतों में फसल अवशेष जलाए जाने के कारण राज्य में वायु प्रदूषण का खतरा लगातार गहराता जा रहा है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 5 नवंबर को पंजाब में पराली जलाने के 440 नए मामले दर्ज किए गए। इसके साथ ही चालू धान कटाई सीजन में खेतों में आग लगाने की कुल घटनाओं की संख्या बढ़कर 2,787 हो गई है। इन घटनाओं ने प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण से जुड़ी एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है।
दरअसल, पंजाब में हर साल धान की कटाई के बाद पराली निपटाने की समस्या सामने आती है। कई किसान अगली फसल की बुवाई के लिए खेतों को जल्दी खाली करने के उद्देश्य से फसल अवशेषों में आग लगा देते हैं। इसका सीधा असर हवा की गुणवत्ता पर पड़ता है। खेतों से उठने वाला धुआं आसपास के इलाकों में फैलता है और वातावरण में प्रदूषण का स्तर बढ़ाने में योगदान देता है। खासकर सर्दियों की शुरुआत में हवा की गति कम होने के कारण प्रदूषक तत्व लंबे समय तक वातावरण में बने रह सकते हैं।
तरनतारन, फिरोजपुर और अमृतसर में सबसे ज्यादा मामले
पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं के आंकड़ों पर नजर डालें तो कुछ जिले इस समस्या से सबसे ज्यादा प्रभावित दिखाई दे रहे हैं। इस सीजन में तरनतारन सबसे आगे है। यहां अब तक पराली जलाने के 586 मामले दर्ज किए जा चुके हैं। वहीं, फिरोजपुर में 361 और अमृतसर में 221 घटनाएं सामने आई हैं।
इन तीनों जिलों में बड़ी संख्या में खेतों में आग लगाए जाने की घटनाएं दर्ज हुई हैं। ऐसे में प्रशासन के सामने इन इलाकों में किसानों को जागरूक करने के साथ-साथ नियमों का पालन सुनिश्चित कराने की चुनौती भी है।
गौरतलब है कि 4 नवंबर को पंजाब में पराली जलाने के 151 नए मामले दर्ज किए गए थे। लेकिन अगले ही दिन यानी 5 नवंबर को यह संख्या बढ़कर 440 पहुंच गई। एक दिन में सामने आए मामलों की इस बढ़ोतरी ने राज्य में पराली प्रबंधन को लेकर चल रही तैयारियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
नियम तोड़ने वाले किसानों पर सख्त कार्रवाई
पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए पंजाब सरकार और प्रशासन की ओर से निगरानी बढ़ाई जा रही है। खेतों में आग लगाने वाले किसानों के खिलाफ पर्यावरण संबंधी नियमों के तहत कार्रवाई की जा रही है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, अब तक उल्लंघन करने वाले किसानों पर करीब 46.10 लाख रुपये का पर्यावरण मुआवजा लगाया जा चुका है। इसमें से लगभग 24.85 लाख रुपये की वसूली भी की गई है।
इसके अलावा, नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत 710 एफआईआर दर्ज की गई हैं। वहीं, सरकारी राजस्व रिकॉर्ड में 829 किसानों की जमीन से संबंधित रेड एंट्री भी की गई है। इस कार्रवाई का उद्देश्य किसानों को पराली जलाने से रोकना और फसल अवशेषों के वैकल्पिक प्रबंधन को बढ़ावा देना है।
रेड एंट्री का मतलब है कि संबंधित किसान के भूमि रिकॉर्ड में पराली जलाने से जुड़े उल्लंघन का उल्लेख किया जाता है। इससे भविष्य में जमीन से जुड़े सरकारी रिकॉर्ड और प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर असर पड़ सकता है।
आखिर किसान क्यों जलाते हैं पराली?
पराली जलाने के पीछे किसानों की कई व्यावहारिक मजबूरियां भी होती हैं। धान की कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच किसानों को आमतौर पर केवल 10 से 25 दिनों का समय मिलता है। इतने कम समय में खेतों से फसल अवशेष हटाकर अगली फसल की तैयारी करना आसान नहीं होता।
कंबाइन मशीन से धान की कटाई के बाद खेत में बड़ी मात्रा में पराली और फसल के अवशेष बच जाते हैं। इन्हें हाथों से हटाने में काफी मेहनत और समय लगता है। दूसरी ओर, पराली प्रबंधन के लिए इस्तेमाल होने वाली मशीनें हर किसान के पास उपलब्ध नहीं होतीं। कई किसानों के लिए इन मशीनों को खरीदना या किराये पर लेना महंगा साबित होता है।
ऐसे में खेत को जल्दी खाली करने के लिए किसान पराली जलाने का रास्ता अपना लेते हैं। उन्हें यह भी चिंता रहती है कि गेहूं की बुवाई में देरी होने से अगली फसल की पैदावार प्रभावित हो सकती है।
पराली जलाने से पर्यावरण को कितना नुकसान?
खेतों में पराली जलाने से निकलने वाला धुआं हवा में सूक्ष्म कणों और अन्य प्रदूषक तत्वों की मात्रा बढ़ा सकता है। इससे सांस लेने में परेशानी, आंखों में जलन और अस्थमा जैसी समस्याओं से जूझ रहे लोगों को अधिक दिक्कत हो सकती है। इसके अलावा मिट्टी के उपयोगी सूक्ष्मजीवों और पोषक तत्वों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, पराली को जलाने के बजाय खेत में मिलाना, मल्चिंग करना या अन्य उपयोगी तरीकों से उसका प्रबंधन करना बेहतर विकल्प हो सकता है।
किसानों को जागरूक करने की भी जरूरत

पराली जलाने की समस्या का स्थायी समाधान केवल जुर्माना और कानूनी कार्रवाई से संभव नहीं है। इसके लिए किसानों को सस्ती मशीनें, उचित तकनीकी सहायता और फसल अवशेषों के बेहतर इस्तेमाल के विकल्प उपलब्ध कराना जरूरी है। सरकार की ओर से भी पराली प्रबंधन को बढ़ावा देने और किसानों को वैकल्पिक तरीके अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने के प्रयास किए जा रहे हैं।
कुल मिलाकर, पंजाब में पराली जलाने के 2,787 मामलों तक पहुंचना चिंता का विषय है। आने वाले दिनों में धान की कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच प्रशासन के सामने इस पर नियंत्रण पाने की बड़ी चुनौती होगी। अब देखना होगा कि जागरूकता अभियान, सरकारी सहायता और सख्त कार्रवाई मिलकर खेतों में आग लगाने की घटनाओं को कितना कम कर पाते हैं।

