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Courtroom Videos : सोशल मीडिया पर कोर्ट वीडियो डालने वालों के लिए आई बड़ी चेतावनी!

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के वीडियो से रील बनाकर कमाई करने वालों पर शिकंजा! सरकार को कार्रवाई का प्रावधान जोड़ने का निर्देश

नई दिल्ली: देश की अदालतों में होने वाली सुनवाई अब आम लोगों की पहुंच में है। सुप्रीम कोर्ट और कई हाई कोर्ट की कार्यवाही को लाइव देखने की सुविधा उपलब्ध है। इसका उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाना और आम नागरिकों को अदालतों की कार्यप्रणाली से परिचित कराना है। लेकिन अब इसी सुविधा का सोशल मीडिया पर गलत इस्तेमाल किए जाने का मामला सामने आया है। अदालतों की सुनवाई के वीडियो से छोटे-छोटे क्लिप बनाकर उन्हें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपलोड किया जा रहा है। कई बार इन वीडियो को संदर्भ से अलग करके पेश किया जाता है और इनके जरिए व्यूज तथा कमाई हासिल करने की कोशिश होती है।

इस मामले को गंभीरता से लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को जरूरी कदम उठाने के निर्देश दिए हैं।

अदालत के वीडियो काटकर सोशल मीडिया पर डालने पर रोक

सुप्रीम कोर्ट 24 जुलाई को ही इस संबंध में आदेश जारी कर चुका है। आदेश के मुताबिक, अदालत की आधिकारिक रिकॉर्डिंग को संबंधित सक्षम अधिकारी की अनुमति के बिना काटना, उसमें बदलाव करना, प्रसारित करना, डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपलोड करना या उससे व्यावसायिक लाभ कमाना प्रतिबंधित है।

इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के महासचिव या संबंधित हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल की अनुमति आवश्यक बताई गई है। हालांकि, समाचार संस्थानों को इन रिकॉर्डिंग के वीडियो क्लिप दिखाए बिना सुनवाई से जुड़ी खबरें प्रकाशित करने की छूट है।

30 अक्टूबर को MeitY को दिया गया अहम निर्देश

30 अक्टूबर को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) से कहा कि वह अदालत के आदेशों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान भी अपनी प्रस्तावित नीति में शामिल करे।

अदालत ने इस बात पर ध्यान दिलाया कि स्पष्ट निर्देशों के बावजूद रिकॉर्डिंग का गलत इस्तेमाल जारी है। केंद्र सरकार की ओर से भी माना गया कि आदेशों का उल्लंघन हो रहा है। ऐसे में केवल नियम बनाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उनका उल्लंघन करने वालों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई की व्यवस्था भी जरूरी है।

वायरल क्लिप से बदल जाता है सुनवाई का पूरा मतलब

दरअसल, अदालत में होने वाली सुनवाई कई बार घंटों तक चलती है। इसमें वकीलों की दलीलें, न्यायाधीशों के सवाल, संबंधित पक्षों के जवाब और मामले से जुड़े कानूनी पहलुओं पर चर्चा होती है। लेकिन सोशल मीडिया पर अक्सर पूरी सुनवाई के बजाय कुछ सेकंड का हिस्सा ही दिखाया जाता है।

उदाहरण के तौर पर, किसी न्यायाधीश की सख्त टिप्पणी या किसी वकील को लगाई गई फटकार को अलग से काटकर वायरल कर दिया जाता है। इससे देखने वाले लोगों के सामने पूरी घटना का सही संदर्भ नहीं पहुंच पाता। कई बार ऐसी क्लिप देखकर लोग मामले की वास्तविक स्थिति जाने बिना ही अपनी राय बनाने लगते हैं।

व्यूज और कमाई के लिए बढ़ रहा है वीडियो का इस्तेमाल

सोशल मीडिया पर विवादित और चौंकाने वाले वीडियो तेजी से लोगों का ध्यान खींचते हैं। अदालतों की सख्त टिप्पणियां और बहस के छोटे हिस्से भी इसी वजह से वायरल हो जाते हैं। कुछ अकाउंट ऐसे वीडियो के जरिए फॉलोअर्स, व्यूज और आर्थिक लाभ हासिल करने की कोशिश करते हैं।

हालांकि, न्यायिक कार्यवाही की पारदर्शिता का उद्देश्य अदालतों की प्रक्रिया को समझाना है, न कि न्यायाधीशों, वकीलों या किसी पक्ष की बातों को मनोरंजन का साधन बनाना।

डिजिटल दौर में न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखना जरूरी

इस पूरे मामले ने सोशल मीडिया के इस्तेमाल और जिम्मेदार पत्रकारिता को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। अदालत की किसी टिप्पणी को समझने के लिए उसका पूरा संदर्भ जानना जरूरी है। कुछ सेकंड की रिकॉर्डिंग किसी मामले का संपूर्ण सच नहीं बता सकती।

सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्देशों का उद्देश्य न्यायिक रिकॉर्डिंग के अनधिकृत इस्तेमाल पर रोक लगाना और अदालतों की गरिमा तथा कार्यवाही की विश्वसनीयता बनाए रखना है। अब सबकी नजर केंद्र सरकार की प्रस्तावित नीति और उसमें शामिल किए जाने वाले कार्रवाई के प्रावधानों पर रहेगी।

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