धर्म/अध्यात्म

जितिया व्रत में भोग को तोरई के पत्तों पर क्यों रखते हैं?

हिंदू धर्म में जितिया व्रत (jitiya vrat 2026) का विशेष महत्व है। इसे जीवित्पुत्रिका व्रत भी कहा जाता है। महिलाएं यह व्रत अपनी संतान की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और सुखी जीवन के लिए रखती हैं। इस अवसर पर भगवान जीमूतवाहन की पूजा-अर्चना करने का विधान है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को विधिपूर्वक करने से शुभ फल मिलते हैं और भगवान जीमूतवाहन की विशेष कृपा बरसती है। इस व्रत के दौरान महिलाएं बच्चों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य, जीवन में तरक्की के लिए कामना करती हैं।

तीन दिनों तक चलने वाले इस पर्व की शुरुआत वैदिक पंचांग के अनुसार आज यानी 2 अक्टूबर को नहाय-खाय के साथ हो रही है। इस व्रत की पूजा और नहाय-खाय के दौरान तोरई के पत्तों का विशेष रूप से प्रयोग किया जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि जितिया व्रत की पूजा में तोरई के पत्तों को क्यों शामिल किया जाता है? अगर नहीं, तो आइए इस आर्टिकल में आपको बताते हैं इसके बारे में।

क्या है तोरई के पत्तों का महत्व?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, तोरई के पत्तों को अधिक शुद्ध और पवित्र माना गया है। जितिया व्रत के दौरान भोग को तोरई के पत्तों पर ही रखा जाता है। व्रत में तोरई के पत्तों को शामिल करने की यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी इस परंपरा को निभाया जा रहा है।

वैदिक पंचांग के अनुसार, आज यानी 2 अक्टूबर को नहाय-खाय है, जिसके साथ जितिया व्रत की शुरुआत होती है। इस दिन महिलाएं स्नान करने के बाद शुद्ध और सात्विक भोजन बनाती हैं। भोग के लिए विशेष रूप से नोनी का साग, रागी की रोटी और कद्दू की सब्जी बनाई जाती है। इसके बाद सभी व्यंजनों को तोरई के पत्तों पर रखकर भोग लगाया जाता है।

प्राप्त होती है भगवान जीमूतवाहन की कृपा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को विधिपूर्वक करने से भगवान जीमूतवाहन प्रसन्न होते हैं और बच्चों की अकाल मृत्यु व गंभीर संकटों से रक्षा करते हैं। इससे उन्हें लंबी आयु का वरदान मिलता है। साथ ही, बच्चों का मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य उत्तम रहता है, उनके जीवन में तरक्की के योग बनते हैं और करियर में आ रही सभी बाधाएं दूर होती हैं।

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