Glacier Flood : नेपाल में ग्लेशियर टूटने से 180 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से आया सैलाब, मची भारी तबाही
नेपाल में ग्लेशियर टूटा तो मची तबाही, 180 KM/H की रफ्तार से दौड़ा मलबा; जानिए कैसे आया मौत का सैलाब

नेपाल के हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर टूटने के बाद आई भीषण बाढ़ ने एक बार फिर पहाड़ों में बढ़ते प्राकृतिक खतरे की गंभीर तस्वीर सामने रख दी है। ऊंचाई वाले इलाके में ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटने के बाद बर्फ, चट्टानों और मिट्टी का विशाल मलबा तेज रफ्तार से नीचे की ओर आया। रास्ते में इसमें पानी और अन्य मलबा जुड़ता गया और कुछ ही समय में यह एक खतरनाक फ्लैश फ्लड में बदल गया।
5140 मीटर की ऊंचाई पर टूटा ग्लेशियर
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, ग्लेशियर का हिस्सा समुद्र तल से करीब 5,140 मीटर की ऊंचाई पर टूटा। बर्फ का भारी हिस्सा पहाड़ी ढलान पर नीचे गिरा और अपने साथ चट्टानों तथा मिट्टी को भी बहा ले गया। इस तरह बर्फ और चट्टानों का तेज प्रवाह तैयार हुआ, जिसे आइस-रॉक एवलांच कहा जाता है।
हिमालय की खड़ी ढलानों और ऊंचाई में तेजी से होने वाली गिरावट ने इस प्रवाह की रफ्तार को और बढ़ा दिया। ग्लेशियर टूटने के बाद मलबा तेजी से नीचे की ओर बढ़ा और रास्ते में मौजूद सामग्री भी इसमें शामिल होती चली गई।
7 मिनट में तय की 20 किलोमीटर की दूरी
इस घटना का सबसे हैरान करने वाला पहलू इसकी रफ्तार रही। उपलब्ध आकलनों के अनुसार, ग्लेशियर टूटने के बाद बना मलबे का प्रवाह करीब 7 मिनट में लगभग 20 किलोमीटर दूर गिरॉन्ग पोर्ट तक पहुंच गया। इसकी अनुमानित गति करीब 50 मीटर प्रति सेकेंड यानी लगभग 180 किलोमीटर प्रति घंटा बताई जा रही है।
इतनी तेज गति से आने वाले मलबे और पानी के सामने लोगों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचने का बेहद कम समय मिला। पहाड़ी घाटियों में संकरी जगह होने के कारण प्रवाह की ताकत और विनाशकारी प्रभाव और बढ़ गया।
नदियों के रास्ते नेपाल तक पहुंचा सैलाब
ग्लेशियर से निकला मलबा पहले लहेंदे खोला नदी में पहुंचा और फिर भोटे कोशी नदी में जा मिला। इसके बाद इसका असर नेपाल के रसुवा जिले के सीमावर्ती क्षेत्रों तक पहुंचा। टिमुरे और रसुवागढ़ी सहित आसपास के इलाकों में बाढ़ और मलबे ने भारी नुकसान पहुंचाया।
सैलाब आगे त्रिशूली नदी की ओर बढ़ा और निचले इलाकों में भी इसका प्रभाव दिखाई दिया। सड़कें, पुल, इमारतें और अन्य बुनियादी ढांचा प्रभावित हुआ। कुछ हाइड्रोपावर परियोजनाओं को भी नुकसान पहुंचने की जानकारी सामने आई है।

जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई चिंता
वैज्ञानिकों के अनुसार, हिमालय में तापमान बढ़ने से ग्लेशियर, पर्माफ्रॉस्ट और पहाड़ी ढलानों की स्थिरता प्रभावित हो सकती है। ग्लेशियरों के पिघलने से पानी चट्टानों की दरारों में पहुंच सकता है, जिससे कुछ क्षेत्रों में भूस्खलन और ग्लेशियर से जुड़ी घटनाओं का जोखिम बढ़ सकता है।
हालांकि किसी एक घटना को सीधे जलवायु परिवर्तन का परिणाम कहना उचित नहीं है। इसके बावजूद बदलती हिमालयी परिस्थितियां भविष्य में ग्लेशियर, झील और नदी से जुड़ी आपदाओं के खतरे को गंभीर बना सकती हैं।
नेपाल की इस घटना ने साफ कर दिया है कि हिमालयी क्षेत्रों में बेहतर निगरानी, रियल-टाइम जलस्तर प्रणाली और प्रभावी अर्ली वॉर्निंग सिस्टम अब पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हैं।


