False Promise of Marriage : रिश्ते में धोखा या शादी से इनकार? सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी ने खींचा ध्यान!
Supreme Court News: शादी का झूठा वादा करने के आरोप में शख्स को राहत, सुप्रीम कोर्ट ने रिश्तों को लेकर दी अहम नसीहत

नई दिल्ली: शादी का वादा करके शारीरिक संबंध बनाने और बाद में शादी से इनकार करने के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम कानूनी टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी रिश्ते के खत्म हो जाने या शादी का वादा पूरा नहीं होने से हर मामले में अपने आप आपराधिक अपराध साबित नहीं हो जाता। इसके लिए यह देखना जरूरी है कि क्या आरोपी ने शुरुआत से ही शादी करने का इरादा नहीं रखते हुए झूठा वादा किया था और क्या उसी वादे के आधार पर महिला की सहमति प्राप्त की गई थी। अदालत ने सहमति से बने रिश्तों को बिना पर्याप्त आधार के आपराधिक मामलों में बदलने के प्रति भी आगाह किया।
क्या है पूरा मामला?
सुप्रीम कोर्ट के सामने छत्तीसगढ़ से जुड़ा एक मामला आया था, जिसमें एक महिला ने आरोप लगाया कि आरोपी ने शादी का भरोसा देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए और बाद में शादी करने से इनकार कर दिया। शिकायत के आधार पर वर्ष 2025 में मामला दर्ज किया गया था। इसके बाद आरोपी के खिलाफ आरोपपत्र भी दाखिल किया गया।
मामले के अनुसार, महिला और आरोपी की मुलाकात प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के दौरान एक अकादमी में हुई थी। धीरे-धीरे दोनों के बीच दोस्ती हुई और फिर प्रेम संबंध बन गए। दोनों परिवारों के बीच शादी को लेकर बातचीत भी हुई थी।
शिकायत में बताया गया कि दोनों के बीच करीब तीन साल तक शारीरिक संबंध रहे। बाद में किसी कारण से रिश्ता आगे नहीं बढ़ पाया और शादी की बातचीत भी सफल नहीं हुई। इसके बाद महिला ने आरोपी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की।
सुप्रीम कोर्ट ने किन तथ्यों पर दिया ध्यान?
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने शिकायत और उपलब्ध तथ्यों का परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि दोनों के बीच लंबे समय तक संबंध रहे थे और परिवारों के बीच विवाह को लेकर बातचीत भी हुई थी।
पीठ ने इस बात पर भी विचार किया कि क्या उपलब्ध सामग्री से यह साबित होता है कि आरोपी ने शुरुआत से ही शादी करने का कोई इरादा नहीं रखा था। अदालत के मुताबिक, केवल रिश्ता टूटने या शादी नहीं हो पाने के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि शुरुआत से ही धोखा देने की योजना थी।
अदालत ने यह भी कहा कि किसी महिला की सहमति को बाद में केवल इसलिए दबाव या गलतफहमी के तहत दी गई सहमति नहीं माना जा सकता कि संबंध अंततः विवाह तक नहीं पहुंचा। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि शादी का झूठा वादा करके धोखा देने वाले व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो सकती। ऐसे मामलों में आरोपों और सबूतों की जांच जरूरी है।
शादी का झूठा वादा कब बन सकता है अपराध?
सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी सिद्धांत स्पष्ट करते हुए कहा कि यह देखना महत्वपूर्ण है कि शादी का वादा करते समय आरोपी की वास्तविक मंशा क्या थी। यदि शुरुआत से ही शादी करने का कोई इरादा नहीं था और महिला को इसी झूठे भरोसे पर शारीरिक संबंध बनाने के लिए तैयार किया गया, तो मामला आपराधिक अपराध के दायरे में आ सकता है।
इसके विपरीत, यदि संबंध आपसी सहमति से बने थे और बाद में परिस्थितियों के कारण शादी नहीं हो सकी, तो केवल इस आधार पर आपराधिक जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती। हर मामले में परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों का मूल्यांकन करना आवश्यक है।
अदालत ने आरोपी के खिलाफ कार्यवाही की रद्द
मामले में सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने पाया कि उपलब्ध सामग्री आरोपी के खिलाफ आपराधिक जिम्मेदारी तय करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं देती। इसके बाद अदालत ने आरोपी के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी।
रिश्तों के मामलों में संतुलित कानूनी दृष्टिकोण जरूरी

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का मुख्य संदेश यह है कि शादी का वादा पूरा नहीं होने और शुरुआत से ही धोखा देने के इरादे में कानूनी अंतर है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि सहमति से बने रिश्तों में बाद में पैदा हुए विवादों को बिना पर्याप्त सबूत के आपराधिक मामलों में नहीं बदलना चाहिए।
वहीं, यदि किसी मामले में वास्तव में झूठे वादे, धोखाधड़ी और उसी के आधार पर सहमति प्राप्त करने के पर्याप्त प्रमाण हों, तो कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है। इसलिए ऐसे मामलों का फैसला केवल रिश्ते के टूटने के आधार पर नहीं, बल्कि पूरे घटनाक्रम और उपलब्ध सबूतों को देखकर किया जाना चाहिए।