प्रेमी जोड़ों के भागने पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, पॉक्सो एक्ट के दुरुपयोग पर जताई चिंता
प्रेमी जोड़ों के भागने पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, पॉक्सो एक्ट के दुरुपयोग पर जताई चिंता; नाबालिगों की निजता पर अहम सुनवाई

देश में प्रेम संबंधों और नाबालिगों के अधिकारों से जुड़े मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि ऐसे मामलों में कानून का संतुलित और संवेदनशील तरीके से इस्तेमाल होना चाहिए। अदालत ने नाबालिग लड़के-लड़कियों के निजता के अधिकार (Right to Privacy) से जुड़े मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए सुनवाई की और इस दौरान पॉक्सो (POCSO) एक्ट के संभावित दुरुपयोग पर भी चिंता व्यक्त की।

सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से उन मामलों का उल्लेख किया, जिनमें प्रेम संबंधों के चलते किशोर-किशोरियां घर से चले जाते हैं या सहमति से संबंध बनाते हैं, लेकिन बाद में उनके खिलाफ पॉक्सो कानून के तहत आपराधिक मामले दर्ज कर दिए जाते हैं।
क्या है पूरा मामला?
सुप्रीम Court के समक्ष ऐसे कई मामलों का संदर्भ आया, जिनमें दो नाबालिग या किशोर-किशोरियां आपसी सहमति से संबंध में थे या साथ रहने के लिए घर छोड़कर चले गए थे। बाद में परिजनों की शिकायत पर लड़के के खिलाफ POCSO Act और अन्य गंभीर धाराओं में मामला दर्ज कर दिया गया।
इन मामलों को देखते हुए शीर्ष अदालत ने स्वतः संज्ञान लेकर यह जानने की कोशिश की कि कहीं कानून का इस्तेमाल ऐसे मामलों में उसके मूल उद्देश्य से हटकर तो नहीं किया जा रहा।
पॉक्सो एक्ट क्या है?
POCSO (Protection of Children from Sexual Offences) Act, 2012 बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा प्रदान करने के लिए बनाया गया विशेष कानून है। इस कानून के तहत 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति को बच्चा माना जाता है और उसके साथ यौन अपराध गंभीर दंडनीय अपराध हैं।
इस कानून का उद्देश्य बच्चों को शोषण और उत्पीड़न से बचाना है, लेकिन अदालत ने कहा कि कुछ मामलों में इसकी व्याख्या और उपयोग को लेकर संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि—
- नाबालिगों के निजता के अधिकार और उनकी गरिमा का सम्मान होना चाहिए।
- प्रेम संबंधों से जुड़े हर मामले को अपराध की दृष्टि से नहीं देखा जा सकता।
- यदि कानून का गलत तरीके से उपयोग होता है, तो इसका असर युवाओं के भविष्य पर पड़ सकता है।
- कानून का उद्देश्य बच्चों की सुरक्षा है, न कि सहमति वाले हर मामले में कठोर कार्रवाई करना।
हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बच्चों के खिलाफ होने वाले वास्तविक यौन अपराधों पर सख्त कार्रवाई जारी रहनी चाहिए।
निजता के अधिकार पर भी चर्चा
सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिगों की निजता और पहचान की सुरक्षा को भी महत्वपूर्ण बताया। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में जांच एजेंसियों और संबंधित संस्थाओं को संवेदनशीलता के साथ कार्य करना चाहिए, ताकि बच्चों की पहचान और सम्मान सुरक्षित रहे।

विशेषज्ञों की राय
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत की टिप्पणी कानून के उद्देश्य और उसके व्यावहारिक उपयोग के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण है।
विशेषज्ञों के अनुसार—
- वास्तविक अपराधों में कठोर कार्रवाई आवश्यक है।
- लेकिन सहमति वाले किशोर संबंधों और गंभीर यौन अपराधों के बीच अंतर को समझना भी जरूरी है।
- इससे न्याय व्यवस्था अधिक संतुलित और प्रभावी बन सकती है।
क्या होगा आगे?
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट इस मामले की सुनवाई कर रहा है। भविष्य में अदालत केंद्र सरकार, राज्यों और संबंधित एजेंसियों से इस विषय पर सुझाव मांग सकती है। यदि आवश्यक हुआ, तो कानून के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर दिशा-निर्देश भी जारी किए जा सकते हैं।
निष्कर्ष
प्रेम संबंधों और किशोरों से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी कानून के संवेदनशील उपयोग की आवश्यकता को रेखांकित करती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि POCSO Act का मूल उद्देश्य बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देना है, इसलिए इसके दुरुपयोग की आशंकाओं पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। साथ ही, नाबालिगों के निजता के अधिकार और सम्मान की रक्षा भी न्याय प्रणाली की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।



