कोयंबटूर में हुई राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण की 29वीं बैठक, बाघों के संरक्षण पर बनी नई रणनीति
कोयंबटूर में हुई राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) की 29वीं बैठक, बाघ संरक्षण पर बनी अहम रणनीति

देश में बाघों के संरक्षण और वन्यजीव सुरक्षा को और मजबूत बनाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (National Tiger Conservation Authority – NTCA) की 29वीं बैठक तमिलनाडु के कोयंबटूर में आयोजित की गई। इस महत्वपूर्ण बैठक में देशभर के टाइगर रिजर्व के अधिकारी, वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी, पर्यावरण विशेषज्ञ और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञ शामिल हुए।

बैठक में बाघों की सुरक्षा, उनके प्राकृतिक आवास (Habitat) का संरक्षण, मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने और आधुनिक तकनीक के माध्यम से निगरानी व्यवस्था को मजबूत बनाने जैसे कई अहम मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गई।
क्या है राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA)?
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करने वाली एक वैधानिक संस्था है। इसकी स्थापना वर्ष 2005 में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत संशोधन के बाद की गई थी।
इस संस्था का मुख्य उद्देश्य देशभर के टाइगर रिजर्व का प्रबंधन, बाघों की सुरक्षा, संरक्षण योजनाओं की निगरानी और राज्यों के साथ समन्वय स्थापित करना है।
बैठक में किन मुद्दों पर हुई चर्चा?
29वीं बैठक के दौरान कई महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श किया गया—
- देश में बाघों की वर्तमान स्थिति की समीक्षा।
- टाइगर रिजर्व में संरक्षण कार्यों की प्रगति।
- मानव और बाघों के बीच बढ़ते संघर्ष को कम करने के उपाय।
- आधुनिक तकनीक, ड्रोन और कैमरा ट्रैप के उपयोग को बढ़ावा।
- अवैध शिकार (Poaching) रोकने के लिए सख्त निगरानी।
- जंगलों में जैव विविधता और पारिस्थितिकी संरक्षण।
- स्थानीय समुदायों की भागीदारी बढ़ाने पर जोर।
भारत में क्यों खास है बाघ संरक्षण?
भारत दुनिया में सबसे अधिक जंगली बाघों वाला देश है। वैश्विक बाघ आबादी का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा भारत में पाया जाता है। यही कारण है कि भारत बाघ संरक्षण के क्षेत्र में विश्व स्तर पर अग्रणी भूमिका निभा रहा है।
सरकार द्वारा चलाया जा रहा प्रोजेक्ट टाइगर (Project Tiger) दुनिया के सबसे सफल वन्यजीव संरक्षण कार्यक्रमों में से एक माना जाता है।
आधुनिक तकनीक से होगी निगरानी
बैठक में वन्यजीव संरक्षण के लिए नई तकनीकों के इस्तेमाल पर विशेष जोर दिया गया।
इनमें शामिल हैं—
- AI आधारित निगरानी प्रणाली।
- कैमरा ट्रैप नेटवर्क।
- ड्रोन सर्विलांस।
- GPS कॉलर ट्रैकिंग।
- डिजिटल डेटा मॉनिटरिंग।
- ई-गश्त (E-Patrolling) सिस्टम।
इन तकनीकों के जरिए बाघों की गतिविधियों पर अधिक प्रभावी तरीके से नजर रखी जा सकेगी।
मानव-वन्यजीव संघर्ष पर चिंता
हाल के वर्षों में कई राज्यों में बाघों और इंसानों के बीच संघर्ष की घटनाएं बढ़ी हैं। बैठक में इस समस्या को गंभीरता से लेते हुए ऐसे क्षेत्रों की पहचान करने और स्थानीय लोगों की सुरक्षा के साथ-साथ वन्यजीव संरक्षण के बीच संतुलन बनाने पर जोर दिया गया।
विशेषज्ञों ने ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता अभियान चलाने और प्रभावित परिवारों को शीघ्र मुआवजा देने की आवश्यकता भी बताई।

स्थानीय समुदाय की भूमिका होगी अहम
बैठक में यह भी कहा गया कि बाघ संरक्षण केवल सरकारी एजेंसियों की जिम्मेदारी नहीं है। स्थानीय समुदाय, वन समितियां और स्वयंसेवी संस्थाएं भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
इसके लिए—
- इको-टूरिज्म को बढ़ावा।
- स्थानीय युवाओं को रोजगार।
- वन संरक्षण में ग्रामीणों की भागीदारी।
- जागरूकता कार्यक्रमों का विस्तार।
जैसे कदम उठाने पर जोर दिया गया।
भारत की उपलब्धियां
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में बाघ संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है।
- देश में बाघों की संख्या लगातार बढ़ी है।
- नए टाइगर रिजर्व घोषित किए गए हैं।
- कई राज्यों में संरक्षण मॉडल को अंतरराष्ट्रीय सराहना मिली है।
- भारत वैश्विक स्तर पर बाघ संरक्षण का प्रमुख उदाहरण बनकर उभरा है।
निष्कर्ष
कोयंबटूर में आयोजित राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) की 29वीं बैठक भारत के वन्यजीव संरक्षण अभियान के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। बैठक में लिए गए निर्णय भविष्य में बाघों की सुरक्षा, जैव विविधता के संरक्षण और मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक तकनीक, स्थानीय समुदाय की भागीदारी और प्रभावी नीतियों के जरिए भारत बाघ संरक्षण के क्षेत्र में अपनी वैश्विक नेतृत्व की भूमिका को और मजबूत करेगा।

