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राजस्थान की 200 साल पुरानी जोधपुरी मोजड़ी को मिला GI टैग, कारीगरों के लिए खुशखबरी

राजस्थान की 200 साल पुरानी जोधपुरी मोजड़ी को मिला GI टैग, पारंपरिक हस्तशिल्प को मिली वैश्विक पहचान

राजस्थान की पारंपरिक हस्तशिल्प कला को एक और बड़ी पहचान मिली है। करीब 200 वर्ष पुरानी ‘जोधपुरी मोजड़ी’ को भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication-GI) टैग प्रदान किया गया है। इस सम्मान के साथ जोधपुरी मोजड़ी राजस्थान की उन विशिष्ट पारंपरिक कलाओं में शामिल हो गई है, जिन्हें उनकी ऐतिहासिक विरासत, गुणवत्ता और भौगोलिक पहचान के आधार पर कानूनी संरक्षण मिला है।

GI टैग मिलने से न केवल इस पारंपरिक फुटवियर की पहचान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत होगी, बल्कि हजारों स्थानीय कारीगरों और हस्तशिल्प उद्योग को भी बड़ा लाभ मिलने की उम्मीद है।


क्या है जोधपुरी मोजड़ी?

जोधपुरी मोजड़ी राजस्थान का पारंपरिक हस्तनिर्मित चमड़े का जूता है। इसकी पहचान इसकी आकर्षक कढ़ाई, हाथ से की गई बारीक सिलाई और बिना मशीन के तैयार होने वाली विशेष बनावट से होती है।

राजस्थान में शादियों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और पारंपरिक आयोजनों में पुरुषों और महिलाओं द्वारा मोजड़ी पहनने की परंपरा आज भी कायम है।


क्या होता है GI टैग?

GI (Geographical Indication) टैग किसी ऐसे उत्पाद को दिया जाता है जिसकी गुणवत्ता, प्रतिष्ठा या विशेष पहचान उसके भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ी होती है।

भारत में GI टैग का पंजीकरण Geographical Indications of Goods (Registration and Protection) Act, 1999 के तहत किया जाता है। यह टैग किसी उत्पाद को नकली उत्पादों से कानूनी सुरक्षा भी प्रदान करता है।


जोधपुरी मोजड़ी की खासियत

  • पूरी तरह हस्तनिर्मित।
  • उच्च गुणवत्ता वाले चमड़े का उपयोग।
  • हाथ से की गई पारंपरिक कढ़ाई।
  • बिना कील और मशीन के विशेष सिलाई तकनीक।
  • राजस्थानी संस्कृति और शाही परंपरा का प्रतीक।
  • लंबे समय तक टिकाऊ और आरामदायक डिजाइन।

GI टैग मिलने से क्या होगा फायदा?

GI टैग मिलने के बाद जोधपुरी मोजड़ी को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में नई पहचान मिलेगी।

प्रमुख लाभ

  • स्थानीय कारीगरों की आय बढ़ेगी।
  • नकली उत्पादों पर रोक लगेगी।
  • निर्यात (Export) को बढ़ावा मिलेगा।
  • पारंपरिक हस्तशिल्प को संरक्षण मिलेगा।
  • राजस्थान के पर्यटन और हस्तशिल्प उद्योग को नई मजबूती मिलेगी।
  • युवाओं में पारंपरिक कला के प्रति रुचि बढ़ेगी।

राजस्थान के लिए क्यों है बड़ी उपलब्धि?

राजस्थान पहले से ही अपनी हस्तशिल्प कला, वस्त्र, पेंटिंग और पारंपरिक उत्पादों के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। जोधपुरी मोजड़ी को GI टैग मिलने से राज्य की सांस्कृतिक विरासत को एक और वैश्विक पहचान मिली है। इससे राजस्थान के पारंपरिक शिल्प को अंतरराष्ट्रीय बाजार में नई पहचान और प्रतिस्पर्धा मिलेगी।


स्थानीय कारीगरों में खुशी

जोधपुर और आसपास के क्षेत्रों में पीढ़ियों से मोजड़ी बनाने वाले कारीगरों ने इस फैसले का स्वागत किया है। उनका कहना है कि GI टैग मिलने से उनके उत्पादों की ब्रांड वैल्यू बढ़ेगी और उन्हें बेहतर कीमत मिलने की संभावना है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस कला को आधुनिक मार्केटिंग और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से जोड़ा जाए तो यह वैश्विक स्तर पर भारतीय हस्तशिल्प की पहचान बन सकती है।


भारत में GI टैग का महत्व

भारत में अब सैकड़ों उत्पादों को GI टैग मिल चुका है। इनमें दार्जिलिंग चाय, कांचीपुरम सिल्क, बनारसी साड़ी, कश्मीर केसर, मैसूर सिल्क और राजस्थान के कई हस्तशिल्प उत्पाद शामिल हैं। GI टैग पारंपरिक उत्पादों की मौलिकता बनाए रखने और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।


निष्कर्ष

करीब 200 साल पुरानी जोधपुरी मोजड़ी को मिला GI टैग राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक हस्तशिल्प के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। यह सम्मान न केवल इस अनूठी कला को वैश्विक पहचान दिलाएगा, बल्कि हजारों कारीगरों के जीवन में आर्थिक बदलाव लाने का भी माध्यम बनेगा। आने वाले समय में जोधपुरी मोजड़ी भारत की हस्तशिल्प पहचान को दुनिया के बड़े बाजारों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

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