शकुनि के जिन पासों ने महाभारत की दिशा बदल दी, उनका अंत कैसे हुआ?

राजा सुबल की हड्डियों से बने शकुनि के पासों का पूरा सच यहां जानें। सहदेव द्वारा शकुनि के वध के बाद भगवान श्री कृष्ण ने उन पासों के साथ क्या किया? पढ़िए पौराणिक कथाओं के अनुसार उनका अंतिम सफर।
महाभारत के सबसे चतुर और विवादास्पद पात्रों में से एक, शकुनि (Shakuni) को उनकी कूटनीति और उन ‘जादुई पासों’ के लिए जाना जाता है। जिन्होंने, कुरुक्षेत्र के युद्ध की नींव रखी। लेकिन, क्या आपने कभी सोचा कि शकुनि की मृत्यु के बाद उन पासों का क्या हुआ?
ऋषि वेदव्यास द्वारा रचित मूल संस्कृत महाभारत के अनुसार, शकुनि के पासे कोई साधारण हाथीदांत के पासे नहीं थे। पौराणिक कथाओं के अनुसार, ये पासे शकुनि के पिता, राजा सुबल की हड्डी से बने थे। मरते समय सुबल ने शकुनि से कहा था कि मेरी हड्डियों के पासे हमेशा तुम्हारी आज्ञा मानेंगे। इन पासों में शकुनि के पूरे परिवार के अपमान और दुख की ऊर्जा समाहित थी। यही वजह थी कि शकुनि जब भी चाहता, पासे वही अंक दिखाते थे।
शकुनि के जादुई पासे की उत्पत्ति से अंत तक की कहानी
पासों का निर्माण और बदले की शपथ (लोक कथा)
महाभारत की प्रचलित लोक कथाओं के अनुसार, शकुनि के पासे हाथीदांत के नहीं, बल्कि उसके पिता राजा सुबल की रीढ़ की हड्डियों से बने थे।
जब धृतराष्ट्र ने शकुनि और उसके पूरे परिवार को जेल में डालकर भूखा रखा था, तब शकुनि के पिता ने मरने से पहले अपनी हड्डियों से पासे बनाने को कहा था। उन्होंने कहा था, “इन पासों में मेरा क्रोध और प्रतिशोध बसता है, ये हमेशा तुम्हारी बात मानेंगे।” यही कारण था कि चौसर के खेल में पासे हमेशा वही अंक दिखाते थे जो शकुनि चाहता था।
महाभारत युद्ध और शकुनि का वध
महाभारत के युद्ध में शकुनि ने कौरवों की ओर से कूटनीति और युद्ध दोनों में भाग लिया। युद्ध के 18वें और अंतिम दिन, पांडव नकुल और सहदेव ने शकुनि की सेना का संहार किया। अंत में, सहदेव ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी करते हुए शकुनि का वध कर दिया।
पासों का अंत: श्री कृष्ण का निर्णय (रहस्य)
शकुनि की मृत्यु के बाद सबसे बड़ा सवाल यह था कि उन मायावी पासों का क्या होगा? कहानी के अनुसार:
शकुनि के वध के बाद पांडव उसके शिविर में उन जादुई पासों को ढूंढने पहुंचे ताकि उन्हें नष्ट किया जा सके और उनका दुरुपयोग फिर न हो।
लेकिन, पांडवों के पहुंचने से पहले ही भगवान श्री कृष्ण वहां पहुंच गए थे। कृष्ण जानते थे कि इन पासों में कलयुग के विनाश के बीज छिपे हैं।
जल में विसर्जन और कलयुग का आगमन
कहा जाता है कि श्री कृष्ण ने उन पासों को अपने हाथों से मसलकर राख (चूर्ण) बना दिया था। जब अर्जुन वहां पहुंचे, तो कृष्ण ने उन्हें वह राख दी और उसे किसी गहरे जल स्रोत या समुद्र में बहाने का आदेश दिया।
अर्जुन ने उस राख को जल में प्रवाहित कर दिया।
शकुनि ने पासों को ऐसा मंत्र दिया था कि वे जल के स्पर्श से पुनः जागृत हो सकते थे। राख के जल में मिलते ही वह नकारात्मक ऊर्जा फिर से अस्तित्व में आ गई।
माना जाता है कि यही ऊर्जा कलयुग के आगमन पर जुए और अधर्म के रूप में वापस लौटी, जिसे आज भी लालच और धोखे के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।




