बेटियों की परवरिश में न करें चूक; आयरन की कमी से लेकर पीयर प्रेशर तक…

एक महिला को अपने जीवनकाल में अलग-अलग पोषण संबंधी जरूरतें पूरी करनी होती हैं। भारतीय बच्चों में खराब पोषण और अस्वस्थता का एक बड़ा कारण गर्भावस्था से पहले, उसके दौरान और बाद में माताओं के पोषण की खराब स्थिति है।
बच्चियों के सही और पोषण वाले आहार की सुलभता अपेक्षाकृत कम होती है, जिससे एनीमिया, कम वजन, धीमे विकास जैसी समस्याएं अक्सर लड़कियों में अधिक देखने में आती हैं। लड़कियों की सेहत की बात करें तो इसका अर्थ केवल बीमारी से बचाव तक सीमित नहीं होना चाहिए। सेहत शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक संतुलन की पूरी तस्वीर होती है।
इसे सुंदर बनाने के लिए समय के साथ उभरने वाली कुछ नई चुनौतियों को भी ध्यान में रखने की जरूरत है । जैसे, छोटी उम्र में ही बढ़ता मोटापा, स्क्रीन टाइम व पीयर प्रेशर के कारण अलग-अलग स्तर पर होने वाली एंग्जाइटी आदि। लड़कियों की सेहत में बड़ा रोड़ा कुछ परंपरागत सामाजिक और लैंगिक मान्यताएं भी हैं। इसमें सबसे सामान्य है बचपन से ही परिवार में सबसे बाद में भोजन करने या बचा-कुचा ग्रहण करने की आदत।
12 की उम्र में 12 हो हीमोग्लोबिन
इसे सामान्य भाषा में खून की कमी भी कहा जाता है। एनीमिया एक ऐसी स्थिति है, जब रक्त में लाल रक्त कोशिकाओं की मात्रा कम हो जाती है। बच्चियां मासिक धर्म की चुनौतियों व पोषण की कमी से आसानी से शिकार हो जाती हैं। इस स्थिति में शरीर को पर्याप्त आक्सीजन युक्त रक्त नहीं मिल पाता, जिससे थकान व कमजोरी बनी रहती है।
यह संज्ञानात्मक विकास को प्रभावित करता है व शारीरिक विकास में भी बाधक है। यह अवसाद और गंभीर हृदय रोग का कारण बन सकता है। यही कारण है कि एनीमिया मुक्त भारत रणनीति के तहत 10 से 19 साल की लड़कियों व किशोरियों को सप्ताह में एक बार आयरन और फैलिक एसिड की एक गोली लेने की सिफारिश की गई है।
प्रत्येक गोली में 60 मिग्रा. प्राकृतिक आयरन और 500 माइक्रोग्राम फैलिक एसिड होता है। सर गंगाराम अस्पताल की वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉक्टर माला श्रीवास्तव के अनुसार, इससे बचाव के लिए 12 की उम्र में उनमें हीमोग्लोबिन का स्तर 12 होना चाहिए।
स्वस्थ आदतों का विकास
बचपन वह समय होता है, जब शरीर और मन दोनों तेजी से विकसित होते हैं। वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. सुशीला कटारिया के अनुसार, छोटी उम्र से ही लड़कियों को सही पोषण, विशेषकर आयरन और कैल्शियम, मासिक धर्म से जुड़ी सही जानकारी के साथ अच्छा दिखना क्या है, यह जानकारी भी देनी चाहिए।
जैसे, बच्चियों को बताएं कि गलत पोषण कैसे उनके अच्छा दिखने में बाधक है। साथ ही स्वस्थ रहने के लिए सक्रिय होना कितना जरूरी है ताकि ब्लड शुगर, थायरॉइड, हाइपरटेंशन और हार्मोनल बदलावों से होने वाली चुनौतियों से बचा जा सके। बच्चियों में होने वाली एंग्जाइटी को हल्के में न लें।
उन्हें बताएं कि मानसिक थकान और भावनात्मक दबाव को कैसे पहचाना जाए और इनसे बचाव के लिए योग व ध्यान को दिनचर्या में शामिल करना जरूरी है। इन आदतों का विकास हो तो इसका सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि लड़कियां बड़ी होकर अपनी सेहत को प्राथमिकता देना सीख सकेंगी। कोई समस्या हो तो उसे टाल देना या समय नहीं है या पहले काम जरूरी है, यह प्रवृत्ति विकसित नहीं हो पाएगी।
एचपीवी वैक्सीन क्यों जरूरी
जागरूकता और जांच से कैंसर का बचाव किया जा सकता है। एक प्रभावी उपाय है एचपीवी वैक्सीन, जिससे सर्वाइकल कैंसर की रोकथाम संभव है। इसे 9-14 साल की बच्चियों को लगवाना चाहिए। वैक्सीन लगवाने से संक्रमण के विरुद्ध प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है। इससे गर्भाशय ग्रीवा कैंसर (90 प्रतिशत तक) व अन्य कैंसर से सुरक्षा मिल सकती है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण – 3 (एनएफएचएस) के अनुसार 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में वजन और मोटापा 127 प्रतिशत बढ़ा है।
2005-06 (एनएफएचएस- 3 ) में 1.5 प्रतिशत से 2019-21 ( एनएफएचएस-5) में 3.4 प्रतिशत तक।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण -5 के अनुसार, भारत में 67.1 प्रतिशत बच्चे और 59.1 प्रतिशत किशोर लड़कियां एनीमिया ग्रस्त हैं। यह सर्वेक्षण यह भी बताता है कि चार में से तीन भारतीय महिलाओं के आहार में आयरन निर्धारित मात्रा से कम होता है।
किशोर लड़कियों में 125 प्रतिशत ( कुल 2.4 प्रतिशत से 5.4 प्रतिशत) तक मोटापा बढ़ा है।
घर का खाना, सेहत का खजाना
डॉ.माला श्रीवास्तव (स्त्री रोग विशेषज्ञ, सर गंगाराम अस्पताल,नई दिल्ली) बताती हैं कि बच्चियों में पोषण की समस्या हल करने का एक बेहतर तरीका है। उन्हें घर में बने भोजन करने के लिए प्रोत्साहित करना। दाल, चावल, सब्जी, रोटी, दही में पोषण तो मिलता ही है साथ ही वजन भी नियंत्रित रहता है। अगर बच्चियां ओवरवेट हैं तो आगे चलकर उन्हें गंभीर बीमारियों का जोखिम रहता है। पीसीओडी और कैंसर सबसे गंभीर खतरा है।
उन्हें कभी कच्चा, साबुत तो कभी केवल उबाल कर, कभी भूनकर, हर रूप में भोजन ग्रहण करने के लिए प्रेरित करें। घर में स्वस्थ तेल- घी का प्रयोग करना चाहिए। भोजन लोहे की कढ़ाही में बनाएं तो आयरन की कमी दूर करने में मदद मिल सकती है। बच्चियों को स्वस्थ भोजन तैयार करने के लिए प्रेरित करना चाहिए, ताकि वे जान सकें कि वे जो बना रही हैं वह कितना स्वस्थ है।
पीयर प्रेशर न बना दे बीमार
डॉ. सुशीला कटारिया (सीनियर डायरेक्टर,इंटरनल मेडिसिन, मेदांता अस्पताल, गुरुग्राम) बताती हैं कि बचपन से ही बच्चों को स्वस्थ आहार के साथ समग्र सेहत के लिए भी प्रोत्साहित करना चाहिए। बच्चियों को भी खेलकूद के लिए समान रूप से प्रोत्साहित करना चाहिए। उन्हें बताएं कि शारीरिक परिवर्तन के कारण शरीर की आवश्यकताएं बदल जाती हैं।
पीरियड्स में होनी वाली अनियमितता, थकान या बार- बार कमजोरी को अनदेखा नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये शरीर के संकेत हो सकते हैं। किशोरावस्था में पीयर प्रेशर भी एक ऐसी चीज है, जो बच्चों में एंग्जाइटी का कारण बनता है । बच्चियां अपनी बाडी इमेज को लेकर अत्यधिक सचेत रहती हैं। इंटरनेट मीडिया के प्रभाव में आकर अपने लुक्स को लेकर प्रयोग करती रहती हैं। मोटापा के कारण बुलिंग या दुबले होने की सनक भी उन्हें बीमार बना सकती है।
इन बातों का रहे ध्यान
दूध को ही संपूर्ण आहार नहीं मानना चाहिए। इसके साथ फल, अनाज, सब्जियां भी महत्वपूर्ण हैं। जन्म के एक साल बाद से ही बच्चियों को सभी प्रकार का आहार देना चाहिए।
लड़कियों की सेहत की वार्षिक रिपोर्ट बनाएं। उनके कमजोर पक्षों पर काम करें ताकि उसकी दिनचर्या में उसी अनुसार बदलाव करते रहें।
बच्ची स्वस्थ दिख रही हो, तब भी उसकी स्वास्थ्य जांच कराएं। परिवार में किसी को कोई बीमारी रही है तो यह जांच अधिक जरूरी हो जाती है।



