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सोरायसिस के 25 प्रतिशत मरीज डिप्रेशन की चपेट में, इम्युनिटी पर भी होता है असर

त्वचा से जुड़ी बीमारियां केवल शरीर तक ही सीमित नहीं रहतीं, बल्कि इसका गंभीर असर मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के एक शोध के मुताबिक, पुराने त्वचा रोग एक्जिमा व सोरायसिस से पीड़ित प्रत्येक चार में से एक मरीज मानसिक बीमारी से ग्रसित है।

इम्युनिटी पर भी होता है असर
यह न केवल शारीरिक, बल्कि गंभीर मानसिक तनाव, सामाजिक शर्मिंदगी और जीवन की गुणवत्ता में गिरावट का कारण बनती हैं। लगातार खुजली और बेचैनी की वजह से त्वचा रोगी का तनाव बढ़ता है, जिसका असर उसकी इम्युनिटी पर भी होता है । इस अध्ययन में प्रदेश के अलग-अलग जिलों के कुल 466 त्वचा रोगियों को शामिल किया गया। शोध रूस के अंतरराष्ट्रीय जर्नल कंसोर्टियम साइकियाट्रिकम में प्रकाशित किया गया है।

मानसिक स्वास्थ भी होती है प्रभावित
शोध टीम में संस्थान के जनरल मेडिसिन विभाग के अध्यक्ष प्रो. विक्रम सिंह, मानसिक रोग विभाग के अध्यक्ष डॉ. एक्यू जिलानी, त्वचा रोग विभाग से डॉ. शिखा अग्रवाल और डॉ. सोनाली सिंह शामिल रहीं। शिखा अग्रवाल एवं डॉ. सोनल सिंह के अनुसार, सोरायसिस, त्वचा और तंत्रिका तंत्र एक-दूसरे के दर्पण माने जाते हैं। यही वजह है कि एक्जिमा, मुंहासे और सफेद दाग जैसी त्वचा संबंधी समस्याएं केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक स्तर पर भी मरीज को प्रभावित करती हैं।

आत्मविश्वास भी खो देते हैं मरीज
चेहरे या शरीर में दिखाई देने वाले हिस्सों पर दाग-धब्बे होने से कई लोग आत्मविश्वास खो देते हैं और सामाज से बचने लगते हैं। जब व्यक्ति लंबे समय तक तनाव में रहता है तो शरीर में हार्मोनल बदलाव होते हैं, जिससे त्वचा की सूजन और एलर्जी की समस्या बढ़ सकती है। इसी तरह त्वचा की समस्या से जूझ रहे मरीजों में चिंता, हीन भावना और अवसाद का खतरा तीन से चार गुणा तक बढ़ता है।

डॉ. एक्यू जिलानी ने बताया कि शोध में प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों के कुल 466 त्वचा रोगियों को दो समूह में बांटा गया। पहले ग्रुप में लंबे समय से एवं बार-बार दाद से पीड़ित होने वाले रोगियों को रखा गया, जबकि दूसरे ग्रुप में पहली बार हुए दाद एवं अन्य त्वचा के मरीजों को शामिल किया गया।

मेंटल हेल्थ और स्किन डिजीज का है गहरा कनेक्शन
इन मरीजों की मानसिक स्थिति की जांच की गई तो चौंकाने वाले परिणाम सामने आए। इनमें 25 प्रतिशत से अधिक यानी 117 रोगी एंग्जाइटी डिसआर्डर से ग्रसित मिले। दरअसल, मानसिक विकार के चलते दाद बार-बार होता है या पूरी तरह कभी ठीक नहीं होता है और समय के साथ बीमारी और गंभीर हो जाती है। शोध अवधि जुलाई 20222 से जुलाई 2023 तक रही।

प्रो. विक्रम सिंह के मुताबिक, इस अध्ययन से यह साबित होता है कि त्वचा की बीमारियों का संपूर्ण उपचार केवल मरहम एवं गोलियों से संभव नहीं है । ऐसे मरीजों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना चाहिए। इनमें रूटीन मानसिक स्वास्थ्य की जांच को शामिल करना होगा, ताकि यह पता चल सके कि मरीजों के लिए एंटी-फंगल थेरेपी ही नहीं, बल्कि मनोचिकित्सक की भी मदद लेना आवश्यक है।

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