22 वर्षीय सानिका ने एवरेस्ट चढ़ाई से पहले बेस कैंप पर किया भरतनाट्यम

मुलुंड के घर में माउंट एवरेस्ट के पोस्टर के ऊपर प्रार्थना के झंडे लहरा रहे हैं। पास ही एक ड्रीमकैचर और व्हाइटबोर्ड टंगा है, जिस पर दुनिया की सबसे ऊंची चोटी के कोऑर्डिनेट्स लिखे हैं। सानिका शाह कहती हैं कि मैंने एवरेस्ट के सपने को सच कर दिखाया। जब वह महज 17 साल की थीं, तब उन्होंने अपनी डायरी में लिखा था कि एक दिन एवरेस्ट पर जरूर चढ़ेंगी।
छह साल बाद सानिका न केवल सागरमाथा पर अपना 22वां जन्मदिन मनाकर लौटी हैं, बल्कि उन्होंने इसके शिखर पर भी फतह हासिल कर ली है। बीती 20 मई को, फिल्म स्कूल की इस शांत स्वभाव वाली ग्रेजुएट ने 8848.86 मीटर की ऊंचाई पर तिरंगा फहराया और सेल्फी ली।
इस सीजन के सैकड़ों अन्य पर्वतारोहियों की तरह शिखर के पास उन्हें भी भारी ट्रैफिक जाम का सामना करना पड़ा, लेकिन जिस बात ने उन्हें सबसे अलग बनाया, वह था एवरेस्ट बेस कैंप का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।
5,300 मीटर की ऊंचाई पर भरतनाट्यम
शिखर की ओर बढ़ने से पहले, 5,300 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर चलना भी आपको बेदम कर देता है, सानिका ने बर्फ की उबड़-खाबड़ जमीन पर एक मैट बिछाई। चार साल की उम्र से भरतनाट्यम सीख रहीं सानिका ने अपनी नीली पोशाक, गजरा और मंदिर के आभूषण पहने और नृत्य किया।
सानिका बताती हैं कि मैंने बहुत पहले ही तय कर लिया था कि जब भी मैं बेस कैंप पहुंचूंगी, मैं सागरमाथा को एक भेंट के रूप में भरतनाट्यम समर्पित करूंगी। तेज हवाओं और कड़ाके की ठंड में मेरा शरीर संघर्ष कर रहा था, लेकिन भावनात्मक और आध्यात्मिक रूप से, मैं उस पल में खुद को बेहद जुड़ा हुआ महसूस कर रही थी।
लॉकडाउन के दौरान जागा पर्वतारोहण का शौक
बचपन से ही डांस और एक्टिंग सानिका की दुनिया थे। लेकिन 2020 में लॉकडाउन के दौरान, उनका रुझान पर्वतारोहण की तरफ बढ़ा। उन्होंने 1996 की एवरेस्ट त्रासदी पर आधारित 2015 की फिल्म एवरेस्ट देखी। वह कहती हैं कि वह पहाड़ बहुत डरावना लेकिन बेहद खूबसूरत लग रहा था। इसके तुरंत बाद उन्होंने अपनी डायरी में एवरेस्ट चढ़ने का संकल्प लिखा।
इसके बाद कड़ी ट्रेनिंग शुरू हुई। वे सीढ़ियों पर दौड़तीं और अपने फिटनेस कोच पार्थ उपाध्याय के साथ पश्चिमी घाट की पहाड़ियों पर चढ़ाई का अभ्यास करती थीं। पार्थ खुद 2019 में तिब्बत की बेहद कठिन तरफ से एवरेस्ट फतह कर चुके हैं।
सपनों के लिए कड़ी मेहनत
फिल्म स्कूल की पढ़ाई के साथ-साथ अपने अलग-अलग पैशन के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं था। उनके इंस्टाग्राम पेज पर घाघरे में डांस रील्स से लेकर ट्रेकिंग गियर और हाइकिंग स्टिक के साथ उनके वीडियो तक का सफर बेहद सहज दिखता है।
उनकी ट्रेनिंग के लिए उनके शिक्षकों ने उन्हें रिहर्सल से जल्दी जाने की अनुमति दी, जबकि उनके माता-पिता ने इस सपने को पूरा करने के लिए पैसे जुटाए। इस सीजन में नेपाल द्वारा एवरेस्ट परमिट फीस बढ़ाए जाने के बाद इस अभियान की लागत 50 लाख रुपये से काफी अधिक रही।
तैयारी के दिनों में रात 1 बजे मुलुंड से प्रभादेवी के सिद्धिविनायक मंदिर तक दौड़ लगाती थीं। एवरेस्ट से पहले उन्होंने माउंट एल्ब्रस और माउंट किलिमंजारो पर भी चढ़ाई की थी। लेकिन पिछले साल अक्टूबर में नेपाल के अन्नपूर्णा क्षेत्र में स्थित 7216 मीटर ऊंचे हिमलुंग हिमाल की चढ़ाई ने उन्हें भरोसा दिलाया कि वे इस दुनिया के लिए बनी हैं। हिमलुंग हिमाल फतह करने वाली वे सबसे कम उम्र की भारतीय और पहली भारतीय महिला बनीं।
एवरेस्ट की डरावनी रातें
एवरेस्ट बेस कैंप पर टेंटों में खाना खाते और बर्फीले तूफानों के दौरान फिल्में देखते हुए दिन बीत रहे थे। इसी बीच 12 मई को जब वे 22 साल की हुईं, तो उन्हें अकेलेपन का सामना करना पड़ा। सानिका कहती हैं कि वह पहला दिन था जब मुझ पर भावनात्मक बोझ हावी हुआ। मुझे अपने परिवार की बहुत याद आ रही थी। रात में पहाड़ों में गूंजने वाले हिमस्खलन की आवाजें आज भी उन्हें डरा देती हैं।
शिखर की ओर बढ़ते कदम भी उम्मीद से कहीं ज्यादा कठिन साबित हुए, क्योंकि उस समय उनके पीरियड्स चल रहे थे। वे बताती हैं कि मैं महसूस कर सकती थी कि मेरा शरीर अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर रहा है। लेकिन मैंने इसे कभी किसी बदनसीबी की तरह नहीं देखा। यह एक महिला होने का हिस्सा है।
जब शेरपा ने बचाई जान
शिखर से नीचे उतरने के तुरंत बाद सानिका बेहोश हो गईं। ठंड की वजह से उनके ऑक्सीजन मास्क के अंदर बर्फ जम गई थी, जिससे हवा का रास्ता ब्लॉक हो गया था। उनके शेरपा गाइड लक्पा तेनजेन शेरपा ने तुरंत अपना मास्क हटाकर उनके चेहरे पर लगा दिया। सानिका भावुक होकर कहती हैं कि अगर लक्पा शेरपा न होते, तो आज मैं यहाँ सुरक्षित नहीं खड़ी होती।
उसी दौरान 20 और 21 मई को एवरेस्ट पर दो भारतीय पर्वतारोहियों की मौत हो गई, जिनमें से एक को सानिका व्यक्तिगत रूप से जानती थीं। उन्होंने कहा कि वह खबर सुनकर मैं टूट गई थी। लेकिन उतनी ऊंचाई पर आपको मानसिक रूप से शांत रहना पड़ता है, क्योंकि खुद को सुरक्षित नीचे लाना ही आपकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है।
सानिका 21 मई को सुबह 3.30 बजे बेहद थकी हुई हालत में बेस कैंप वापस लौटीं। एयरपोर्ट पर माता-पिता और कोच को गले लगाकर रो पड़ीं।
