Digital Psychology : सोशल मीडिया के एल्गोरिदम कैसे प्रभावित करते हैं हमारी इच्छाएं और फैसले
क्या हमारी इच्छाओं को भी नियंत्रित कर रही हैं डिजिटल कंपनियां? जानिए कैसे काम करते हैं सोशल मीडिया के एल्गोरिदम

आज के डिजिटल दौर में सोशल मीडिया हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक, कई बार हम बिना किसी खास उद्देश्य के मोबाइल फोन उठाते हैं और फेसबुक, इंस्टाग्राम या दूसरे प्लेटफॉर्म पर वीडियो देखने लगते हैं। शुरुआत में हम सोचते हैं कि केवल पांच मिनट बिताएंगे, लेकिन देखते ही देखते आधा घंटा या उससे भी ज्यादा समय निकल जाता है। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों होता है? क्या यह केवल हमारी आदत है या डिजिटल प्लेटफॉर्म भी हमारे व्यवहार और इच्छाओं को प्रभावित करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं?
व्यवहार विज्ञान और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़े अध्ययन इस सवाल को समझने में मदद करते हैं। इनसे पता चलता है कि डिजिटल कंपनियां लोगों की पसंद, भावनाओं और ऑनलाइन गतिविधियों का विश्लेषण करके ऐसी सामग्री दिखा सकती हैं, जो उनका ध्यान लंबे समय तक बनाए रखे।
क्या है व्यवहार विज्ञान और इसका डिजिटल दुनिया से संबंध?
व्यवहार विज्ञान यानी बिहेवियरल साइंस वह क्षेत्र है, जिसमें यह समझने का प्रयास किया जाता है कि मनुष्य किसी विशेष परिस्थिति में किस तरह सोचता है, निर्णय लेता है और व्यवहार करता है। हमारी आदतें कैसे बनती हैं, हम किसी चीज की ओर आकर्षित क्यों होते हैं और दूसरे लोगों का व्यवहार हमारे फैसलों को किस तरह प्रभावित करता है, ये सभी इसके अध्ययन के महत्वपूर्ण पहलू हैं।
आज डिजिटल कंपनियां इसी समझ के साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एल्गोरिदम का इस्तेमाल करती हैं। उपयोगकर्ता किस वीडियो को ज्यादा देर तक देखता है, किस पोस्ट को पसंद करता है, किस विषय पर टिप्पणी करता है और किस लिंक पर क्लिक करता है, इन संकेतों के आधार पर प्लेटफॉर्म उसकी संभावित रुचियों का अनुमान लगाते हैं।
इसके बाद उपयोगकर्ता को उसी तरह की सामग्री बार-बार दिखाई जा सकती है। इससे उसे अपनी पसंद की चीजें आसानी से मिलती हैं, लेकिन कई बार वह बिना किसी स्पष्ट उद्देश्य के भी लगातार स्क्रीन पर समय बिताता रहता है।
शोध में भी सामने आया भावनात्मक सामग्री का प्रभाव
डिजिटल प्लेटफॉर्म के प्रभाव को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने कई अध्ययन किए हैं। वर्ष 2014 में फेसबुक पर प्रकाशित एक चर्चित शोध में लगभग 6.89 लाख उपयोगकर्ताओं की न्यूज फीड में दिखाई जाने वाली भावनात्मक सामग्री में बदलाव किया गया था।
शोधकर्ताओं ने पाया कि उपयोगकर्ताओं को दिखाई गई सामग्री का उनकी अपनी पोस्ट में इस्तेमाल किए गए सकारात्मक और नकारात्मक भावनात्मक शब्दों पर छोटा, लेकिन मापने योग्य प्रभाव पड़ा। इस अध्ययन ने संकेत दिया कि सोशल मीडिया पर दिखाई जाने वाली सामग्री लोगों की भावनात्मक अभिव्यक्ति को प्रभावित कर सकती है।
वहीं, वर्ष 2017 के एक अध्ययन में पाया गया कि लोगों के व्यक्तित्व के अनुरूप तैयार किए गए विज्ञापनों से सामान्य विज्ञापनों की तुलना में अधिक क्लिक और खरीदारी दर्ज की जा सकती है। इससे डिजिटल मार्केटिंग में व्यक्तिगत पसंद और व्यवहार संबंधी आंकड़ों के महत्व का पता चलता है।
हालांकि, इन अध्ययनों का यह अर्थ नहीं है कि सोशल मीडिया हर व्यक्ति की भावनाओं या फैसलों को पूरी तरह नियंत्रित कर सकता है।
कैसे आदत बन जाता है बार-बार मोबाइल देखना?
जब कोई प्लेटफॉर्म लगातार हमारी पसंद के वीडियो, तस्वीरें और पोस्ट दिखाता है, तो वहां समय बिताना आसान और आकर्षक हो जाता है। कभी कोई मजेदार वीडियो, कभी चौंकाने वाली खबर और कभी किसी परिचित की पोस्ट हमें अगली सामग्री देखने के लिए प्रेरित करती है।
धीरे-धीरे मोबाइल खोलना एक नियमित आदत बन सकता है। कई बार हम किसी जरूरी काम के लिए फोन उठाते हैं, लेकिन नोटिफिकेशन देखकर दूसरी सामग्री में उलझ जाते हैं। इसका असर समय के इस्तेमाल, एकाग्रता और रोजमर्रा के कामों पर भी पड़ सकता है।
क्या हमारी इच्छाएं भी दूसरों के प्रभाव से बनती हैं?
इस सवाल का संबंध केवल तकनीक से नहीं, बल्कि मानवीय स्वभाव से भी है। हम कई बार किसी वस्तु को इसलिए पसंद करने लगते हैं, क्योंकि वह दूसरों के पास होती है, समाज में लोकप्रिय होती है या उससे खुशी मिलने की उम्मीद होती है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म इस प्रक्रिया को तेज कर सकते हैं। लगातार दिखाई जाने वाली जीवनशैली, महंगे उत्पादों और लोकप्रिय लोगों की तस्वीरें हमारे मन में नई इच्छाएं पैदा कर सकती हैं। लेकिन हर आकर्षक चीज हमारे लिए जरूरी हो, यह आवश्यक नहीं है।
डिजिटल दुनिया में जरूरी है अपनी इच्छाओं को समझना
तकनीक से पूरी तरह दूरी बनाना जरूरी नहीं है। जरूरत इस बात की है कि हम अपनी डिजिटल आदतों और फैसलों के प्रति जागरूक रहें। मोबाइल इस्तेमाल करने का उद्देश्य तय करना, गैरजरूरी नोटिफिकेशन बंद करना और स्क्रीन टाइम पर ध्यान देना उपयोगी कदम हो सकते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी इच्छा का पैदा होना और उसका हमारे लिए सही होना, दोनों अलग बातें हैं। इसलिए केवल यह समझना पर्याप्त नहीं कि एल्गोरिदम हमें कैसे प्रभावित करते हैं। हमें यह भी देखना होगा कि हम किसी आकर्षण के पीछे क्यों भाग रहे हैं और क्या वह वास्तव में हमारी जरूरत है।

आखिरकार, डिजिटल दुनिया में असली चुनौती केवल समय बचाने की नहीं, बल्कि अपने ध्यान, निर्णयों और इच्छाओं को समझने की भी है। जब हम अपनी पसंद पर सवाल करना सीखते हैं, तभी यह तय कर पाते हैं कि किसी चीज को हम वास्तव में चाहते हैं या बार-बार उसके सामने आने के कारण उसे चाहने लगे हैं।



