पितृ पक्ष की द्वादशी आज: वाराणसी-प्रयागराज में श्राद्ध और तर्पण का विशेष महत्व, संन्यासी पूर्वजों के लिए भी आज का दिन खास
पितृ पक्ष की द्वादशी आज, वाराणसी-प्रयागराज में श्राद्ध और तर्पण का विशेष महत्व

पितृ पक्ष के दौरान आज आश्विन कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि है और हिंदू धार्मिक परंपरा में इस दिन का विशेष महत्व माना जाता है। पंचांग के अनुसार 7 अक्टूबर 2026, बुधवार को द्वादशी श्राद्ध मनाया जा रहा है। वाराणसी के लिए उपलब्ध पंचांग में द्वादशी तिथि 7 अक्टूबर को सुबह से लेकर रात तक रहने की जानकारी दी गई है। इस दिन पितरों के निमित्त श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण जैसे कर्म किए जाते हैं।
उत्तर प्रदेश के वाराणसी और प्रयागराज जैसे प्रमुख धार्मिक नगरों में पितृ पक्ष के दौरान गंगा और संगम तट पर श्राद्ध कर्म की विशेष परंपरा रही है। प्रयागराज के लिए जारी पितृ पक्ष की तिथियों में 7 अक्टूबर को द्वादशी/महाश्राद्ध बताया गया है। वहीं वाराणसी से संबंधित धार्मिक जानकारी के अनुसार द्वादशी तिथि उन पूर्वजों के श्राद्ध के लिए महत्वपूर्ण है, जिनका निधन द्वादशी तिथि को हुआ हो।
संन्यासी पूर्वजों के लिए भी विशेष दिन
द्वादशी श्राद्ध का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि धार्मिक परंपरा में इसे उन व्यक्तियों के श्राद्ध के लिए भी उपयुक्त माना जाता है, जिन्होंने मृत्यु से पहले संन्यास ग्रहण किया था। वाराणसी से प्रकाशित जानकारी में 7 अक्टूबर को संन्यासियों के श्राद्ध की तिथि बताया गया है। ऐसी मान्यता है कि परिवारजन इस दिन विधि-विधान से पितरों का स्मरण करते हुए उनकी आत्मिक शांति के लिए प्रार्थना करते हैं।
श्राद्ध कर्म में जल, तिल, कुश और पिंड जैसे पारंपरिक पदार्थों का उपयोग किया जाता है। तर्पण के माध्यम से पितरों का स्मरण करते हुए जल अर्पित किया जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में श्राद्ध की विधि में कुछ अंतर हो सकता है, इसलिए लोग स्थानीय परंपरा और पुरोहितों द्वारा बताए गए नियमों का पालन करते हैं।
वाराणसी और प्रयागराज में धार्मिक गतिविधियां
गंगा के घाट और प्रयागराज का संगम पितृ कर्म के लिए देश के प्रमुख धार्मिक स्थलों में गिने जाते हैं। पितृ पक्ष के अवसर पर यहां दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालु अपने पूर्वजों के लिए पूजा, तर्पण और पिंडदान करते हैं। वाराणसी में गंगा घाटों पर तर्पण की परंपरा और प्रयागराज में संगम तट पर पितृ कर्म धार्मिक रूप से खास माना जाता है।

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पितरों के प्रति श्रद्धा और स्मरण का पर्व
पितृ पक्ष को केवल धार्मिक अनुष्ठानों का समय ही नहीं, बल्कि पूर्वजों के प्रति सम्मान और स्मरण का अवसर भी माना जाता है। परिवार अपने दिवंगत सदस्यों को याद करते हैं और उनके नाम से दान-पुण्य तथा भोजन कराने जैसी परंपराओं का पालन करते हैं। कई परिवारों में कौवे, गाय और अन्य जीवों को भोजन कराने की परंपरा भी प्रचलित है, हालांकि इन रीति-रिवाजों का स्वरूप समुदाय और परिवार के अनुसार अलग हो सकता है।
2026 में पितृ पक्ष की शुरुआत 26 सितंबर से हुई और सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर को होगी। इसके बीच 7 अक्टूबर को द्वादशी श्राद्ध के बाद 8 अक्टूबर को त्रयोदशी और 9 अक्टूबर को चतुर्दशी श्राद्ध मनाया जाएगा।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धा और विधि के साथ किया गया श्राद्ध कर्म पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम है। द्वादशी के दिन विशेष रूप से संन्यासी पूर्वजों और द्वादशी तिथि में दिवंगत हुए लोगों का स्मरण किए जाने की परंपरा इसे पितृ पक्ष के महत्वपूर्ण दिनों में शामिल करती है।
