India-US Trade Deal: भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर निर्मला सीतारमण का बड़ा बयान, बोलीं- आगे की रियायतें देना ‘बहुत मुश्किल’
निर्मला सीतारमण का बड़ा बयान, बोलीं- आगे रियायत देना बहुत मुश्किल

भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर एक बार फिर तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं हो पाई है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है कि दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते को लेकर बातचीत कठिन और बेहद गहन रही है। उन्होंने संकेत दिया कि बातचीत अब ऐसे मुकाम पर पहुंच गई है जहां आगे किसी भी पक्ष के लिए अतिरिक्त रियायत देना आसान नहीं होगा।

वित्त मंत्री के मुताबिक, भारत और अमेरिका के बीच बातचीत अभी जारी है, लेकिन दोनों पक्षों के सामने कई ऐसे मुद्दे हैं जिन पर समझौता करना चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है। उन्होंने मौजूदा स्थिति को एक तरह का ‘प्लेटो’ यानी ठहराव बताया, जहां आगे बढ़ने के लिए दोनों देशों को सीमित गुंजाइश के भीतर रास्ता तलाशना होगा।
क्या बोलीं निर्मला सीतारमण?
निर्मला सीतारमण ने कहा कि भारत-अमेरिका समझौते पर बातचीत लगातार जारी है और यह समझौता काफी मेहनत और कठोर वार्ता के बाद यहां तक पहुंचा है। उनके मुताबिक, अब दोनों पक्ष एक ऐसे पड़ाव पर हैं जहां आगे ज्यादा ‘give and take’ करना बहुत मुश्किल हो सकता है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अगर किसी मुद्दे पर आगे बढ़ने की गुंजाइश बचती है तो दोनों पक्ष उसका इस्तेमाल कर सकते हैं।
वित्त मंत्री की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब भारत और अमेरिका के बीच बहुप्रतीक्षित व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने की कोशिशें जारी हैं। इससे पहले अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमीसन ग्रीर भी संकेत दे चुके हैं कि वार्ता अंतिम चरण में है, लेकिन समझौते पर तत्काल हस्ताक्षर होने की स्थिति नहीं बनी है। दोनों देशों ने कुछ महत्वपूर्ण ‘sticking points’ की पहचान की है।
ट्रेड डील में कहां फंस रही है बात?
भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते का मकसद दोनों देशों के बीच बाजार पहुंच बढ़ाना और व्यापारिक बाधाओं को कम करना है। बातचीत में टैरिफ, मार्केट एक्सेस, गैर-टैरिफ बाधाएं, डिजिटल ट्रेड और रणनीतिक क्षेत्रों में सहयोग जैसे मुद्दे शामिल रहे हैं। जून में हुई वार्ता में दोनों पक्षों ने इन प्रमुख क्षेत्रों की व्यापक समीक्षा की थी।
लेकिन हालिया बातचीत में कई मुद्दों पर दोनों देशों की अपेक्षाओं में अंतर बना हुआ है। अमेरिका भारत से कुछ क्षेत्रों में ज्यादा बाजार पहुंच चाहता है, जबकि भारत अपने घरेलू उद्योग और रणनीतिक हितों से जुड़े मुद्दों पर सावधानी बरत रहा है।
यही वजह है कि समझौते के अंतिम स्वरूप को लेकर अभी भी बातचीत का दौर चल रहा है और दोनों देश किसी जल्दबाजी वाले फैसले से बचते दिखाई दे रहे हैं।
भारत के लिए रियायतें देना क्यों आसान नहीं?
भारत के लिए किसी भी व्यापार समझौते में बड़ी रियायत देने से पहले घरेलू उद्योगों पर पड़ने वाले असर को देखना जरूरी है। कृषि, विनिर्माण, डेयरी और कुछ संवेदनशील क्षेत्रों में आयात बढ़ने की स्थिति घरेलू उत्पादकों के लिए चुनौती बन सकती है।
ऐसे में सरकार के सामने दोहरी चुनौती है—एक ओर अमेरिका के साथ बाजार तक बेहतर पहुंच और व्यापारिक संबंध मजबूत करना, वहीं दूसरी ओर भारतीय कारोबारियों और घरेलू उद्योगों के हितों की रक्षा करना।
निर्मला सीतारमण ने यह भी रेखांकित किया कि भारत का अमेरिका के साथ व्यापार संतुलन फिलहाल भारत के पक्ष में है। उन्होंने अमेरिका के साथ भारत के व्यापार अधिशेष की ओर इशारा करते हुए यह बात कही कि वाशिंगटन स्वाभाविक रूप से इस असंतुलन को कम करना चाहेगा।
अमेरिका के साथ भारत का व्यापार अधिशेष बना मुद्दा
भारत और अमेरिका के बीच व्यापार संबंधों में यह आंकड़ा भी महत्वपूर्ण है कि भारत अमेरिका को जितना निर्यात करता है, उसके मुकाबले वहां से अपेक्षाकृत कम आयात करता है। इसी व्यापार संतुलन को अमेरिका लंबे समय से चर्चा का विषय बनाता रहा है।
हालिया रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका के साथ भारत का व्यापार अधिशेष लगभग 34 अरब डॉलर बताया गया है, जबकि इससे पहले यह करीब 41 अरब डॉलर था। भारत की ओर से अमेरिका से ऊर्जा समेत कुछ क्षेत्रों में खरीद बढ़ाने से इस अंतर में कमी आने की उम्मीद जताई गई है।
सीतारमण ने तुलना करते हुए भारत और चीन के बीच व्यापार घाटे का भी उल्लेख किया। उनका संकेत था कि व्यापार असंतुलन को केवल टैरिफ या दबाव के जरिए नहीं, बल्कि बातचीत और व्यापक आर्थिक साझेदारी के जरिए हल करने की कोशिश होनी चाहिए।
रूस से तेल खरीद पर अमेरिकी दबाव का असर
भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता के बीच एक और अहम मुद्दा रूसी तेल बना हुआ है। हाल में अमेरिका में पारित कानून के बाद रूस से बड़ी मात्रा में तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने की संभावनाओं ने बातचीत को और जटिल बनाया है। भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है, ऐसे में यह मुद्दा नई व्यापार वार्ता पर दबाव डाल रहा है।
यही वजह है कि व्यापार समझौता अब सिर्फ टैरिफ और बाजार पहुंच का मामला नहीं रह गया है, बल्कि इसमें ऊर्जा सुरक्षा, रूस से संबंध और भारत-अमेरिका रणनीतिक रिश्ते भी अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं।
पीयूष गोयल की बातचीत पर भी नजर
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल भी हाल में अमेरिका दौरे पर रहे हैं और वहां अमेरिकी अधिकारियों तथा व्यापार प्रतिनिधियों के साथ समझौते को लेकर बातचीत की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच भी 30 सितंबर को फोन पर बातचीत हुई थी, जिसमें दोनों नेताओं ने भारत-अमेरिका साझेदारी को मजबूत करने की प्रतिबद्धता दोहराई। व्यापार, ऊर्जा, रक्षा और उभरती तकनीकों पर भी चर्चा हुई।
इसके बावजूद अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि की ओर से यह संकेत दिया गया है कि समझौते पर हस्ताक्षर तुरंत होने वाले नहीं हैं, क्योंकि कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर अभी सहमति बनना बाकी है।
आगे क्या होगा?
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि भारत और अमेरिका इन अटके हुए मुद्दों पर किस तरह समझौते तक पहुंचते हैं। दोनों देशों के बीच आर्थिक रिश्ते काफी महत्वपूर्ण हैं और अमेरिका भारत का प्रमुख निर्यात बाजार है। ऐसे में दोनों पक्षों के लिए एक ऐसा समझौता जरूरी है जो व्यापार बढ़ाने के साथ दोनों देशों के हितों का संतुलन भी बनाए रखे।
निर्मला सीतारमण के बयान से इतना साफ है कि भारत किसी दबाव में आकर जल्दबाजी में बड़ी रियायत देने के मूड में नहीं है। दूसरी ओर, अमेरिका भी अपने व्यापार घाटे और बाजार पहुंच से जुड़े मुद्दों पर ठोस परिणाम चाहता है। ऐसे में आने वाले दिनों में होने वाली बातचीत यह तय करेगी कि यह डील आगे बढ़ती है या फिर बातचीत का मौजूदा गतिरोध कुछ और समय तक जारी रहता है।


