Trump Iran Hormuz Crisis: होर्मुज़ संकट के बीच ट्रंप का बड़ा दावा, बोले- ईरान जल्द मानेगा बात; तेल की कीमतों पर भी नजर
होर्मुज़ स्ट्रेट पर बढ़ा तनाव, ईरान के सरेंडर वाले बयान के बीच तेल की कीमतों पर नजर

अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव का सबसे बड़ा केंद्र इस समय होर्मुज़ स्ट्रेट बना हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार ईरान पर दबाव बढ़ाने की बात कर रहे हैं। ट्रंप का कहना है कि अगर ईरान युद्ध समाप्त करता है और समझौते की दिशा में आगे बढ़ता है तो तेल की कीमतों में गिरावट आ सकती है। वहीं, ईरान ने संकेत दिया है कि वह अमेरिकी आधिकारिक जवाब का इंतजार कर रहा है और कूटनीतिक बातचीत का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं हुआ है।

होर्मुज़ स्ट्रेट को लेकर बढ़ा गतिरोध
होर्मुज़ स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है। इस मार्ग से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और LNG का अंतरराष्ट्रीय कारोबार होता है। ऐसे में यहां लंबे समय तक यातायात बाधित रहने से वैश्विक ऊर्जा बाजार पर सीधा असर पड़ सकता है।
हाल के दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत के संकेत जरूर मिले हैं, लेकिन दोनों पक्ष अपनी-अपनी शर्तों पर कायम हैं। Reuters के मुताबिक, ईरान ने होर्मुज़ स्ट्रेट को सात दिनों के भीतर फिर से खोलने और बातचीत शुरू करने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन ट्रंप ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया।
ईरान का क्या है रुख?
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची के मुताबिक, तेहरान अभी भी कूटनीति के लिए तैयार है। उनका कहना है कि ईरान ने मध्यस्थों के जरिए अपना प्रस्ताव अमेरिका तक पहुंचाया है और वह अमेरिकी आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार कर रहा है।
ईरान की शर्तों में अमेरिकी सैन्य दबाव और नौसैनिक नाकेबंदी में बदलाव तथा आर्थिक प्रतिबंधों में राहत जैसे मुद्दे शामिल हैं। हालांकि, अमेरिका की ओर से अभी तक इन शर्तों पर अंतिम सहमति नहीं बनी है।
इससे पहले ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने संयुक्त राष्ट्र में कहा था कि ईरान अमेरिका के सामने आत्मसमर्पण नहीं करेगा, हालांकि उन्होंने कूटनीतिक समाधान की संभावना को भी खारिज नहीं किया था।
ट्रंप के रुख से क्या बदला?
डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के प्रस्ताव को खारिज करने के बावजूद बातचीत की संभावना को पूरी तरह खत्म नहीं किया है। उन्होंने कहा है कि अमेरिकी वार्ताकार इस सप्ताह ईरान के साथ आगे की बातचीत कर सकते हैं।
इसका मतलब है कि फिलहाल स्थिति दबाव और बातचीत दोनों के बीच बनी हुई है। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपनी परमाणु गतिविधियों और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर ठोस आश्वासन दे, जबकि ईरान अमेरिकी सैन्य और आर्थिक दबाव को कम करने की मांग कर रहा है।
तेल की कीमतों पर क्या होगा असर?
होर्मुज़ स्ट्रेट को लेकर तनाव बढ़ने पर तेल की सप्लाई बाधित होने की आशंका से कीमतों में तेजी आती है। इसके उलट अगर अमेरिका और ईरान के बीच समझौता होता है और स्ट्रेट से सामान्य आवाजाही बहाल होती है, तो बाजार में सप्लाई को लेकर चिंता कम हो सकती है।
लेकिन फिलहाल तेल बाजार में राहत के बजाय फिर दबाव देखने को मिला है। 28 सितंबर को शुरुआती कारोबार में Brent crude करीब 1.27% बढ़कर 105.64 डॉलर प्रति बैरल और WTI करीब 0.76% बढ़कर 93.11 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंचा। यह तेजी ट्रंप द्वारा ईरान के प्रस्ताव को खारिज किए जाने के बाद आई।
भारत पर भी पड़ सकता है असर
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में आयात पर निर्भर है। इसलिए अगर होर्मुज़ स्ट्रेट में लंबे समय तक व्यवधान रहता है और वैश्विक तेल कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो इसका असर भारत के आयात बिल, पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों और महंगाई पर पड़ सकता है।
हालांकि, सितंबर में मध्य-पूर्व के प्रमुख तेल उत्पादकों से निर्यात में सुधार के संकेत भी मिले हैं। Kpler के शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर में प्रमुख मध्य-पूर्वी उत्पादकों का संयुक्त कच्चा तेल निर्यात बढ़कर करीब 12.8 मिलियन बैरल प्रतिदिन रहा, जबकि होर्मुज़ से होकर होने वाला प्रवाह भी बढ़ा है।
अब आगे क्या?
अमेरिका और ईरान के बीच अगली बातचीत इस पूरे संकट की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण हो सकती है। अगर दोनों पक्ष होर्मुज़ स्ट्रेट को दोबारा सामान्य रूप से खोलने और युद्ध समाप्त करने की दिशा में सहमत होते हैं, तो ऊर्जा बाजार को राहत मिल सकती है।
वहीं, अगर बातचीत फिर विफल होती है और सैन्य तनाव बढ़ता है, तो तेल की सप्लाई को लेकर चिंताएं दोबारा तेज हो सकती हैं। फिलहाल ईरान अमेरिकी आधिकारिक जवाब का इंतजार कर रहा है और अमेरिका की ओर से बातचीत जारी रखने के संकेत मिले हैं, इसलिए संकट का अंतिम समाधान अभी स्पष्ट नहीं है।
